मानवेन्द्रनाथ राय (नरेन्द्रनाथ भट्टाचार्य) — एक अंतरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी और स्वतंत्र चिंतक
मानवेन्द्रनाथ राय का जीवन अनेक रूपों और विचारों से भरा हुआ था। परिस्थितियों के अनुसार उन्हें अलग-अलग नाम अपनाने पड़े। माता-पिता द्वारा दिया गया उनका मूल नाम नरेन्द्रनाथ भट्टाचार्य था। अमेरिका में उन्होंने स्वयं को मानवेन्द्रनाथ राय कहा। मुम्बई में गिरफ्तारी के समय उनका नाम डॉक्टर महमूद था और विदेशों में लंबे समय तक वे फादर जे. सी. मार्टिन के नाम से भी कार्य करते रहे।महान क्रान्तिकारी नेतामानवेन्द्रनाथ राय एक अंतरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी थे। उन्होंने जर्मनी, मैक्सिको, जापान, अमेरिका और रूस जैसे अनेक देशों में रहकर मजदूर संगठनों को मजबूत किया और साम्यवादी नेता के रूप में प्रसिद्ध हुए।रूस के महान क्रान्तिकारी नेता व्लादिमीर लेनिन ने उन्हें रूस आमंत्रित किया। विश्व के कम्युनिस्ट संगठन ‘थर्ड इंटरनेशनल’ में उन्हें महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। साम्यवाद के प्रचार-प्रसार में उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया, किन्तु बाद में उनके विचारों में परिवर्तन आया और लेनिन से मतभेद होने पर उन्होंने साम्यवाद से दूरी बना ली तथा भारत लौट आये।
जन्म और प्रारम्भिक जीवन नरेन्द्रनाथ भट्टाचार्य का जन्म सन् 1881 में बंगाल के चौबीस परगना जिले में हुआ। उनके पिता का नाम दीनबन्धु भट्टाचार्य था। उस समय ईसाई और इस्लाम मतों के बढ़ते प्रभाव के कारण मूर्तिपूजा पर प्रश्न उठ रहे थे। ब्रह्म समाज और आर्य समाज जैसे संगठनों द्वारा मूर्तिपूजा का विरोध किया जा रहा था। इसी वातावरण के प्रभाव से उन्होंने भी कई मूर्तियाँ तोड़ीं, जो उनके विद्रोही और क्रान्तिकारी स्वभाव का परिचायक था।
बंग-भंग आन्दोलन में सहभागिता1905 के बंग-भंग आन्दोलन के उग्र वातावरण में वे क्रान्तिकारियों की टोली से जुड़ गये। पुलिस ने उन्हें कई बार गिरफ्तार किया, किन्तु प्रमाण न मिलने पर छोड़ना पड़ा। अंततः बिना किसी ठोस आरोप के उन्हें लगभग डेढ़ वर्ष तक नजरबन्द कर जेल में रखा गया।
विदेशों में क्रान्तिकारी गतिविधियाँ प्रथम विश्व युद्ध के आरम्भ पर वे विदेश गये ताकि भारत के स्वतंत्रता संग्राम के लिए हथियार जुटाए जा सकें। फादर जे. सी. मार्टिन के नाम से पादरी बनकर उन्होंने अनेक देशों की यात्रा की।जर्मनी में ‘बर्लिन समिति’ के सहयोग से उन्होंने ‘मैवरिक’ नामक जहाज भारत भेजा, जिसमें लगभग 30 हजार राइफलें, कारतूस और युद्ध सामग्री थी। यदि यह सामग्री क्रान्तिकारियों तक पहुँच जाती तो अंग्रेजी सरकार के लिए गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता था, किन्तु सरकार को इसकी सूचना मिल गयी और सारा सामान जब्त कर लिया गया।नरेन्द्रनाथ से मानवेन्द्रनाथअंग्रेजी सरकार उनकी तलाश में थी, इसलिए वे स्थान बदलते हुए हिंद-चीन, जापान और सुमात्रा आदि देशों में घूमते रहे। विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद वे अमेरिका गये और वहीं उन्होंने नरेन्द्रनाथ से अपना नाम बदलकर मानवेन्द्रनाथ राय रख लिया। दोनों नामों का अर्थ समान था, किन्तु नया नाम मानवतावादी विचारों का प्रतीक था।स्वतंत्र विचार और मतभेदमानवेन्द्रनाथ राय स्वतंत्र चिंतक थे। किसी भी राजनीतिक दल के कठोर अनुशासन में उनका मन नहीं लगता था। रूस और जर्मनी के साम्यवादी संगठनों से भी उनके मतभेद हो गये। दिसम्बर 1930 में वे भारत लौट आये।21 जुलाई 1931 को मुम्बई में उनकी गिरफ्तारी हुई और उन्हें बरेली जेल में रखा गया। वहीं उनकी पत्राचार के माध्यम से प्रसिद्ध क्रान्तिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल से वैचारिक चर्चा होती रहती थी।1924 के पुराने वारंट के आधार पर कानपुर में उन पर मुकदमा चलाया गया। यह मुकदमा बन्द कमरे में चला और उन्हें 12 वर्ष के निर्वासन की सजा सुनाई गयी, जिसे अपील में घटाकर छह वर्ष कर दिया गया।जेल से मुक्ति और अंतिम जीवनसरकार उनके विचारों पर लगातार नजर रखती रही। जब उसे लगा कि अब उन्हें जेल में रखने की आवश्यकता नहीं है, तब उन्हें मुक्त कर दिया गया।प्रारम्भ में उन्होंने भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए संघर्ष किया। बाद में वे श्रमिकों के शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने लगे और अंततः मानवतावादी विचारधारा के समर्थक बन गये। जीवन के अंतिम समय में उनका किसी राजनीतिक दल से संबंध नहीं रहा।24 जनवरी 1954 को इस महान प्रतिभा और ऊर्जा से भरपूर क्रान्तिकारी का निधन हो गया। इतना विशाल कार्य करने के बावजूद उनके निधन पर बहुत कम लोगों ने उन्हें याद किया।










