कार्तिक उरांव

0
2

कार्तिक उरांव
जन्म दिन 29 अक्तूबर पर पुण्य स्मरण

झारखण्ड के गुमला जिला के लिटाटोली गांव में 29 अक्तूबर 1924 को कार्तिक उरांव का जन्म हुआ था. कार्तिक उरांव ने आदिवासियों के धर्मांतरण का विरोध किया था। कार्तिक उरांव की मांग थी कि जनजातियों को मिलने वाली सुविधाओं का लाभ इसाई एवं मुसलमान में धर्मांतरित लोगों को नहीं मिले।

आज झारखंड में एक नया प्रपंच रचा जा रहा है कि आदिवासी हिन्दू नहीं हैं। वैसे आदिवासी शब्द ही गलत है। इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले महात्मा गांधी के अनुयायी ठक्कर बापा ने किया था। वह ब्रिटिश की फैलाई हुई काल्पनिक आर्य आक्रमण थ्योरी से प्रभावित थे।

जिसे आज हम झारखंड कहते वह उस समय बिहार का हिस्सा था। आदिवासियों में एक अफवाह फैलाई गई कि आदिवासी हिन्दू नहीं ईसाई हैं। उस समय कार्तिक उरांव, जो वनवासियों के समुदाय से थे एवं कांग्रेस में इंदिरा गांधी के समकक्ष नेता थे, ने इसका बहुत ही कड़ा और कारगर विरोध किया। उन्होंने कहा कि पहले सरकार इस बात को निश्चित करे कि बाहर से कौन आया था ? यदि हम यहाँ के मूलवासी हैं तो फिर हम ईसाई कैसे हुए क्योंकि ईसाई पन्थ तो भारत से नहीं निकला। और यदि हम बाहर से आये ईसाईयत को लेकर, तो फिर आर्य यहाँ के मूलवासी हुए। और यदि हम ही बाहर से आये तो फिर ईसा के जन्म से हज़ारों वर्ष पूर्व हमारे समुदाय में निषादराज गुह, शबरी, कणप्पा आदि कैसे हुए ? उन्होंने यह कहा कि हम सदैव हिन्दू थे और रहेंगे।
उसके बाद कार्तिक उरांव ने बिना किसी पूर्व सूचना एवं तैयारी के भारत के भिन्न भिन्न कोनों से वनवासियों के पाहन, वृद्ध तथा टाना भगतों को बुलाया और यह कहा कि आप अपने जन्मोत्सव, विवाह आदि में जो लोकगीत गाते हैं उन्हें हमें बताईए। और फिर वहां सैकड़ों गीत गाये।
सबों में यही वर्णन मिला कि यशोदा जी बालकृष्ण को पालना झुला रही हैं, सीता माता राम जी को पुष्पवाटिका में निहार रही हैं, कौशल्या जी राम जी को दूध पिला रही हैं, कृष्ण जी रुक्मिणी से परिहास कर रहे हैं, आदि आदि।
साथ ही यह भी कहा कि हम एकादशी को अन्न नहीं खाते, जगन्नाथ भगवान की रथयात्रा, विजयादशमी, रामनवमी, रक्षाबन्धन, देवोत्थान पर्व, होली, दीपावली आदि बड़े धूमधाम से मनाते हैं।
फिर कार्तिक उरांव ने कहा कि यहाँ यदि एक भी व्यक्ति यह गीत गा दे कि मरियम ईसा को पालना झुला रही हैं और यह गीत हमारे परम्परा में प्राचीन काल से है तो मैं भी ईसाई बन जाऊंगा। उन्होंने यह भी कहा कि मैं वनवासियों के उरांव समुदाय से हूँ। हनुमानजी हमारे आदिगुरु हैं और उन्होंने हमें राम नाम की दीक्षा दी थी। ओ राम , ओ राम कहते कहते हम उरांव के नाम से जाने गए। हम हिन्दू ही पैदा हुए और हिन्दू ही मरेंगे।

एक नया षड्यंत्र
बहुजन साहित्य प्रसार केंद्र नागपुर ने एक फर्जी किताब कार्तिक उरांव के नाम से छापी है जिसमे यह सिद्ध करने का यत्न किया गया है कि आदिवासी हिन्दू नहीं है।

कृपया इस जानकारी को आगे पहुंचाएं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here