अम्बाप्रसाद सूफी पुराने क्रान्तिकारी थे। उनका पहला नाम अमृतलाल था। बाद में वह अम्बाप्रसाद सूफ़ी नाम से प्रसिद्ध हुए। अन्त में गिरफ़्तारी से बचने के लिए वह ईरान चले गये। वहीं उनकी मृत्यु हुई और वहीं इनकी समाधि भी बनी है।पत्रकारअमृतलाल पढ़े लिखे पत्रकार थे।’ अमृत बाज़ार पत्रिका’ से उनका सम्बन्ध था। उन दिनों भोपाल रियासत का अंग्रेज़ रेजीडेंट भोपाल के नवाब से कुछ रुष्ट हो गया। वह आये दिन नवाब की शिकायतें लिख कर भेजता, जिससे नवाब को गद्दी से उतार कर उसकी रियासत सरकार हड़प ले। उन दिनों अमृतलाल (अम्बाप्रसाद सूफ़ी) ने स्वयं को अनपढ़ बता कर उसी रेजीडेंट के घर में बर्तन मांजने की नौकरी कर ली।उसके बाद आये दिन अमृत बाजार पत्रिका में रेजीडेंट के विरोध में सनसनीखेज ख़बरें छपने लगीं। रेजीडेंट परेशान था कि अख़बार तक ये ख़बरें पहुंच कैसे जाती हैं। अमृतलाल का घर में सब जगह आना-जाना था। कोठी के लोगों की बातचीत से उसे ख़बरों के लिए मसाला मिलता था।पकड़वाने वाले को भारी इनामरेज़ीडेंट ने कोठी के सब लोगों को बुला कर कहा: ‘ये सब ख़बरें कोई हमारी कोठी से ही अख़बार को भेजता है। जो कोई उसे पकड़वा देगा, उसे हम भारी इनाम देंगे।’परन्तु कुछ लाभ न हुआ। खबरें पहले की तरह छपती रहीं। उनका परिणाम यह हुआ कि रेजीडेंट साहब को भोपाल से हटा कर दिल्ली भेज दिया गया। उन्होंने भोपाल से विदा होते समय अपने सब कर्मचारियों को बख्शीश दी। बर्तन मांजने वाले अमृतलाल को भी इनाम मिला।कुछ महीने बाद एक दिन एक भद्र वेशधारी बाबू जैसा एक पुरुष रेजीडेंट साहब के दिल्ली निवास पर आया। रेजीडेंट ने उससे आने का कारण पूछा, तो उसने बताया कि वह अपना इनाम लेने आया है?’कैसा इनाम ?’ रेजीडेंट ने पूछा।’आपने कहा था कि जो अमृत बाजार पत्रिका में आपके विरुद्ध छपने वाली खबरों को भेजने वाले का पता देगा, उसे आप बड़ा इनाम देंगे’, अमृतलाल ने कहा।’कौन था वह ?”वह मैं ही था’, अमृतलाल ने कहा।सरकारी नौकरी ठुकराईरेजीडेंट साहब चकित रह गये। उन्होंने ध्यान से देखा, तो बर्तन मांजने वाले अमृतलाल को पहचान लिया। गोरे रेजीडेंट ने कहा ‘सरकार के लिए काम करो, तो अच्छी बड़ी नौकरी दिला देता हूं। वही इनाम होगा।’अमृतलाल ने कहा : ‘मुझे सरकारी नौकरी नहीं करनी है।’ और बिना इनाम लिये वहां से चलता बना। रेजीडेंट चकित रह गया, यही अमृतलाल का बड़ा इनाम था।छह साल जेल मेंजो सरकार का विरोध करेगा, उसे कष्ट उठाना ही पड़ेगा। अमृतलाल को भी पकड़ कर छह वर्ष जेल में रखा गया। अब और जेल में रहना वह नहीं चाहते थे, इसलिए सन् 1909 में वह जहाज द्वारा ईरान चले गये। उनका विचार था कि अफगानिस्तान और ईरान से उन्हें अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए सहायता मिल सकेगी। परन्तु वह आशा पूरी नहीं हुई।सूफी आकाईरान में उनका नाम अम्बाप्रसाद सूफी था। लोग उन्हें ‘सूफ़ी आका’ कह कर बुलाते थे। सरदार अजीतसिंह भी उनके साथ गये थे। अंग्रेजी सरकार ने उन दोनों को पकड़ने की बहुत कोशिश की, परन्तु स्थानीय लोग उनके प्रेमी बन गये थे। वे उन्हें बचाने में सहायता करते रहे।एक बार वे दोनों ऐसे घिर गये कि पुलिस से बचने का कोई रास्ता न रहा। तब वे तेल के खाली ड्रमों में बैठ गये और उन ड्रमों को ऊंटों पर लाद दिया गया। पुलिस को सन्देह तक न हुआ कि तेल के ड्रमों में आदमी बैठे हो सकते हैं।लड़ते लड़ते पकड़े गयेआखिर सन् 1915 में शीराज शहर में वे पुलिस के घेरे में फंस गये। अम्बाप्रसाद सूफी का दायां हाथ एक दुर्घटना में जाता रहा था। फिर भी उन्होंने दूसरे हाथ से पिस्तौल चलाते हुए पुलिस का सामना किया। जब गोलियां समाप्त हो गईं, तब तो पकड़े जाना था ही।योग द्वारा प्राण त्यागेयह तय था कि अगले दिन उन्हें गोली से उड़ा दिया जायेगा। सवेरे जब उनकी कोठरी का द्वार खोला गया, तब वह समाधि की मुद्रा में बैठे थे, परन्तु उनके प्राण शरीर को छोड़ कर जा चुके थे।इस चमत्कार के कारण वह वहां के लोगों के लिए श्रद्धा के पात्र बन गये। आज भी लोग उन समाधि पर सिर नवाते हैं।
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गौ-रक्षा हो, गौ-रक्षा हो
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गौ-रक्षा हो, गौ-रक्षा हो !भारत में हे भारतवालो !गौ-रक्षा हो, गौ-रक्षा हो ।हे आर्य जाति के प्रिय लालो !गौ-रक्षा हो, गौ-रक्षा...
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गौ माता करे पुकार दुःखी मन तड़प रही।
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गौ माता करे पुकार
गौ माता करे पुकारदुःखी मन तड़प रही।बेकस बेबस लाचारदुःखी मन तड़प रही।
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खुशी आने से पहले
खुशी आने से पहले जाने को तैयार रहती है।गमी आकर सदा इन्सान को गमखार रहती है।खुशी दहलीज को ही छू के...
गर भला किसी का कर न सको तो बुरा किसी का...
Arya Samaj - 0
गर भला किसी का
गर भला किसी का कर न सको तो बुरा किसी का मत करना।अमृत का घूँट पिला न सको तो जहर पिलाते...
























