यम॑ग्ने॒ मन्य॑से र॒यिं सह॑सावन्नमर्त्य तमा नो वाज॑सातये॒
वि वो मद॑ य॒ज्ञेषु चित्रमा भ॑रा विव॑क्षसे।। ऋः १०.२१.४
तर्जः मीरा बाई कातर वेड़ी
हे सहसावन् ! तू महान है, तेरी अद्भुत कृति,
तेरी महत्ता अनुभव करता, पाऊँ शरणागति॥
सुन लो प्रभु मेरी अरजी॥
॥हे सहसावन्॥
माँगना चाहूँ पर क्या माँगूँ? योग्यता है नहीं याचक की (2)
योग्य समझते हो वो दे दो, तुम पूरण अनुभवी॥
॥हे सहसावन्॥
उन्नति हेतु मुझे यदि तेरे, बल का लाभ दिया तूने प्रभु
फिर भी यदि आ ही गया विमद तो, होंगी ना उन्नति ॥
॥हे सहसावन्॥
मैं तो तेरी या देवों की पूजा का ही धन बल मागूँ।
यज्ञरूप कर्मों के हेतु पाऊँ तुमसे सति ॥
॥हे सहसावन्॥
मुझे चित्रधन अपना दे दो आत्मा गुणों से होवे चित्रित (2)
यदि सत्वगुण धारण कर लूँ कहलाऊँ तब धनी॥
॥हे सहसावन्॥
परितृप्त मैं खुद को कर के, तेरे उस दिव्य रूप को पाऊँ (2)
मनुष्यत्व देवत्व का बल दो, हे मेरे रयिपति॥
॥हे सहसावन्॥
(सहसावन) शक्ति का भण्डार। (रयि) देने योग्य ऐश्वर्य। (कृति) कार्य। (सति) दान।
(चित्रबन) विलक्षण धन, प्रभु-गुणों से चित्रित धन। (सत्वगुण) अच्छे काम करने के
गुण। (रयिपति) धन ऐश्वर्यों के स्वामी।










