है ऋतुराज का आगमन
है ऋतुराज का आगमन,
जल-थल में छवि आई है।
प्रकृति देवी नवल रंग में
रंगमञ्च पर आई है ॥
विरस द्रुमों ने नवल दलों से
निज शृङ्गार बनाया है।
मानो श्रीवसन्त स्वागत हित
रुचि वितान बनाया है।
कुसुमभार का हार पहनकर
मतवाले से झूम रहे।
कभी-कभी वे अनुरागवश
अवनि चरण को चूम रहे ॥
सरल रसाल साल में मञ्जुल
पीतमञ्जरी आई है।
सरसों सुमन पीत भूतल में
पीताम्बर छवि-छाई है ।
चित्र विचित्र वेश-भूषा में
चित्रित मन हो जाता है।
नीरस हृदयों में सहसा ही,
प्रेम बीज बो जाता है ।
श्री ऋतुराज राज की लक्ष्मी
नये ढंग से आती है।
‘श्रीहरि’ विश्व-रंगशाला में
नये रंग दिखलाती है ॥










