सुन्दर भोजन वस्त्र, राजसुख जिसने छोड़ा।
सुन्दर भोजन वस्त्र, राजसुख जिसने छोड़ा।
सास, ससुर, परिवार-प्रेम का बन्धन तोड़ा ॥
हठकर पति के संग विपिन में रहना चाहा।
सहकर कष्ट कठोर पतिव्रत धर्म निबाहा ॥ १॥
भारत के कवि कीर्ति न जिसकी कह थकते हैं।
उस देवी को भूल कभी क्या हम सकते हैं ?
जब तक हिन्दूजाति धरातल पर जीवित है।
तब तक उसकी कीर्ति-कथा सादर संचित है॥ २॥
हृदय में यदि जाति-द्वेष का विष न बहेगा।
देश-भेद-भय सच्चरित्रता में न रहेगा ॥
तो उसका सम्मान सभ्य संसार करेंगा।
मान उसे आदर्श नारि-जीवन सुधरेगा ॥ ३॥
जनकसुता, सुन्दरी, शुभा, साध्वी सुकुमारी।
सती, सुशीला, सदाचारिणी विदुषी नारी ॥
रामप्रिया, पति-भक्ति-भूषिता थी वह सीता।
अब तक है हृदयस्थ, काल यद्यपि अति बीता ॥ ४ ॥
दशरथ ने युवराज, राम को करना चाहा।
राज्य-भार अधिकार उन्हीं पर धरना चाहा ॥
सुनकर प्रजासमेत राजकुल ने सुख माना।
पर कैकेयी रूठ गई उसने हठ ठाना ॥ ५॥
भूप मनाने लगे- प्रिये, माँगो, मैं दूँगा।
करता हूँ प्रण अटल, कहोगी वही करूँगा ॥
पति को वश में जान, कहा उसने, वर दो।
सच्चे हो तो सफल मनोरथ मुझको कर दो ॥ ६ ॥
भरत बने युवराज, राम हों काननवासी ।
सुनते ही गिर पड़े भूप, छा गई उदासी ॥
पितु के प्रण की बात राम ने जब सुन पाई।
राज छोड़ वन चले राम-लक्ष्मण दोऊ भाई ॥ ७॥
रोकर हाय, अचेत गिरी कौसल्या माता।
बढ़ा हर्ष में शोक, विमुख हो गया विधाता ॥
सुना शोक-संवाद, विकल सीता उठ धाई।
करती हुई विलाप, राम के सम्मुख आई॥ ८॥
निष्ठुर बनो न आर्यपुत्र करुणा उर धारो।
दासी को ले-साथ नाथ वन ओर सिधारो ॥
वन के कष्ट सहर्ष आपके साथ सहूँगी।
नाथ तुम्हारे विना स्वर्ग में भी न रहूँगी ॥ ९॥
सुख से पति के साथ बसूँगी निर्भय वन में।
कुटिया का आनन्द कहाँ है राजभवन में ॥
साथ ले-चलो नाथ, नहीं, जीवित न रहूँगी।
कैसे विषम-वियोग दुःसह दुःख हाय सहूँगी ॥ १०॥
सुन सीता के वचन राम श्रद्धा में साने।
उमड़ा प्रेम-समुद्र, लगे उसको समझाने ॥
दुर्गम वन का भूरि भयानक दृश्य दिखाया।
पशु, निशिचर, गिरि, नदि आदि से बहुत डराया ॥ ११ ॥
पर पति-प्रेम-सरोज भ्रमर सीता के मन में।
कंटक भय ने नहीं विषाद बढ़ाया वन में ॥
हठ कर पति के संग रही वह वन-वन फिरती।
राक्षसों द्वारा कभी विषम संकट में घिरती ॥ १२॥
खा केवल कन्द मूल फल, भू-पर सोती थी।
वल्कल वस्त्र लपेट न मन-मलिना होती थी ॥
वन दारुण कष्ट धैर्य धर कर सहती थी।
पति सेवा में मग्न प्रसन्न सदा रहती थी ॥ १३॥
पञ्चवटी में पहुँच राम ने कुटी बनाई।
सीता देवीसहित बसे वे दोनों भाई ॥
धोखा देकर उन्हें चोर लंकेश अभागा।
सूनी पाकर कुटी जानकी को ले-भागा ॥ १४॥
विनती करने लगा-कहा, ‘बन मेरी रानी’।
पर सीता ने झिड़क कहा- ‘सुन रे अज्ञानी’ ॥
चोर, निर्लज्ज चुराकर लाया मुझको।
इसका दण्ड कठोर अवश्य मिलेगा तुझको ॥ १५॥
पापी मेरे साथ ही मृत्यु आई है तेरी।
अब तू अपने सर्वनाश में समझ न देरी ॥
रहा मानना दूर, बात सुन भी न सकूँगी।
प्राणेश्वर से रहित कभी मैं जी न सकूँगी ॥ १६॥
सागर में पुल बाँध उतर कर डाला डेरा।
वानर सेन, सबन्धु राम ने लंका घेरा ॥
बेटा-बन्धु समेत दुष्ट रावण को मारा।
मिला अलौकिक सती जानकी को छुटकारा ॥ १७ ॥
वन-निवास की अवधि वर्ष चौदह जब बीते।
कहा राम ने- ‘चलो अवध हे लक्ष्मण सीते ‘ ॥
सीता लक्ष्मण राम अयोध्या में फिर आये।
मिलकर जननी बन्धु, मित्र से अति सुख पाये ॥ १८ ॥
निष्कलंक सच्चरित जानकी ने दिखलाया।
पड़ रावण के हाथ सतीत्व स्वधर्म बचाया ॥
दृढ़ पतिव्रता भारतीय ललना हैं जैसी।










