वाज॑स्य॒ नु प्र॑स॒वे मातरं म॒हीमद॑िति॒ नाम॒ वच॑सा करामहे। यस्यया॑
उ॒पस्य॑ उ॒र्वप॒न्तरि॑क्षं सा नः शर्म त्रिवरूं नि य॑च्छात्॥१॥ यजु. १८/३०
तर्जः माय भवानी तुझे लेकरु
भूमिमाता राज्यवान् है आत्मा जन जन की
देवो! आत्मा जन-जन की॥
॥ देवों !!।
भूमिमात का राष्ट्र शरीर है, सामूहिक आत्मा है जनों की (2)
दिखे समष्टि रूप अखण्डित है देवी अवनि॥ ॥ देवों !!।
भूमि पर मानव पशु वृक्ष वस्तु सम्पत्ति सब माता की (2)
वैयक्तिक सुख-वाज-दातृता रसवत् रक्षितृ॥ ॥ देवों !!।
इस अदिति माता को अपने अभिमुख हम कर लेवें मन से
इक स्वर से जयजयकार करें हम, गूँज उठे वाणी भी॥ ॥ देवों !॥
आचरण और चर्चायें परस्पर करके उन्नत भाव जगायें (2)
उन्नति पायें, कमी न होवें ज्ञान अन्न बल की॥ ॥ देवों !॥
ईश्वर हमें समष्टिरूप ‘अदिति’ की धारणा उत्पन्न कर दें।
प्रतिरूप हम धर्म निभायें प्रेरणा दे प्रेक्षण की॥ ॥ देवों !!
धर्म कर्म कर्तव्य प्रेरणा बिन कैसे हो मातोपासना (2)
अन्न ज्ञान बल धन समपत्ति मिले सभी को भूयण की। ॥ देवों !!।
हे सवितः अपनी महिमाता के प्रति धर्म-प्रेरणा भर दो।
सारे व्यक्ति भेद भुलायें मित्र दृष्टि दो दृश्वन की॥ (दृ) ॥ देवों !॥
(समष्टि) सब का समूह। (प्रतिरूप) अपने जैसा रूप। (अवनि) घरा, धरतीं। (वाज)
धन ऐश्वर्य बल। (दातृता) दान देने वाली, दानी। (अदिति) अखण्डनीय शक्ति । (अभिमुख)
सामने, अनुकूल। (प्रचरण) प्रचार। (प्रतिरूप) अपने जैसा रूप। (प्रेक्षण) देखने की क्रिया।
(मातोपासना) माता की उपासना। (भूयण) भूमि। (महीमाता) पृथ्वी माता। (दृश्वन)
दर्शक। (व्यक्तिभेद) आपस के मंद भाव। (रक्षित) संरक्षक।










