सत्यं वृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म युज्ञः पृथिवीं धारयन्ति ।
सा नौ भूतस्य॒ भव्य॑स्य॒ पत्युरुं लोकं पृथ्विी नंः कृणोतु ॥१
॥ अथर्वः १२.१.१
तर्जः मनलो भले मन मोहले
वसुधा हमें उन्नत करे, उसके ही गुण धारण करें
सङ्कल्प अभिसम्पन्न करें, भूमि सा धैर्य वहन करें
॥ वसुधा॥
भूमि में गुण मिले सत्य का (2), सत्य में है ब्रह्माण्ड स्थित
भूमि भी सत्य पे आश्रित, बन सत्यशील भ्रमण करे।
॥ वसुधा ॥
सत्याचरण तेजस्विता, सङ्कल्प दृढ़ निस्वार्थता
परोपकारिणी है व्रतचर्या, षट्गुण स्वतः धारण करे॥
॥ वसुधा॥
यही प्रार्थना करते हैं हम, विस्तृत विशुद्ध बनाओ तुम
गुण-साधनाओं द्वारा हम, तुझ पर हृदय-वारन करें।
॥ वसुधा॥
तादात्म्य राष्ट्र से हम करें, उज्जवल बनायें भविष्य हम
सुविशाल होवे उपासना, तुझे बार-बार नमन करें।॥
॥ वसुधा॥
तेरी गोद में जीवन मरण, रहना है तब तक सत्यसन्ध
हे मातृभूमि! हे भगवती!, अपनाने का तुझे प्रण करें।
॥ वसुधा ॥
तेरे सद्गुणों को धारकर, करते रहें सच्चा पूजन
दृढ़ भूत की चट्टान पर, निज भव्य उत्तमोत्तम करें।
॥ वसुधा॥
(वसुधा) पृथ्वी। (धैर्य) धीरज। (व्रतचया) व्रत पर चलना। (अभीसम्पन्न) पूर्ण रूप में
सफल। (विस्तृत) विशाल। (वारन) न्योछावर। (तादात्म्य) तत्स्वरूपता। (भव्य) भविष्य।
(सत्यसन्ध) सत्यवादी।










