गंगा यमुना जहां विचरती

0
16

गंगा यमुना जहां विचरती

तर्ज – नीले पर्वतों की धारा……

गंगा यमुना जहां विचरती,
कितनी पावन है ये धरती
मेरे देश की SSS
पैदा हुये हैं जहाँ राम से,
जन्मे जहाँ पे घनश्याम से

पपीहा भी पी-पी-पी,
राग सुनाता है मस्तक
वो धारती माँ को, ‘सचिन’
झुकाता है गंगा यमुना जहाँ विचरती,
किनी पावन है ये धारती गंगा……

कपिल कणाद जैसी,
हुयी यहाँ आत्मा दयानन्द
बिरजानन्द से,
ज्ञानी महात्मा गंगा यमुना
जहाँ विचरती,
कितनी पावन है ये धारती….

झीलें कहीं पे गहरी,
कहीं जलधार है खिले है
कहीं पे फूल, कहीं लगे खार है
गंगा यमुना जहाँ विचरती,
कितनी पावन ये धरती……