सफर की धुप में सायो की याद आती है।

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सफर की धुप में सायो की याद आती है।

सफर की धुप में सायो
की याद आती है।
भुले हुओं को जैसे राहो
की याद आती है।


तृष्णा न जीर्णाणी जब
तक है दम मे दम”
इतना उठा चले है कि
बोझल हुए कदम”
थकने के बाद सबको
पछतावों की याद आती हैं। ।।१।।

घर से जो पहिले नीकले
आगे चले गये मौसम था
जब सुहाना भागे चले गये
ठहरे हुऐ कूओं को सरिताओं
की याद आती है। ।।२।।

दम्भी हठीली रस्मों को
ही पतवार जान बैठे दो
चार ही कदम को संसार
मान बैठे तंग से हुए घरोदें
हवाओं की याद आती है। ।।३।।

मंजिल का पता नहीं
चलने को चल दिया”
अफसोस तन का सूरज
ढलने को चल दिया”
ऐसे में ही सुरेन्द्र ना खुदाओं
की याद आती है। ।।४।।