धर्म कर्म के बिना मोल जीवन का कहाँ
लेख जीवों के लिखे वो पिता परमात्मा ॥
योनि योनि घूम के जन्म कर्म भोग के
स्वार्थ में उलझा रहा मोह माया जोड़के
ज्ञान था न भान था धर्म से अन्जान था
दौड़ विषयों की रही रात दिन गुजरे यूँ ही
सहते सहते यातना ॥ धर्म कर्म…
श्वास श्वास जोड़के जो मिली है जिन्दगी
कुछ सुकर्म में तो कुछ लगा प्रभु में मन कभी
तेज विद्या बुद्धिबल अपने प्रभु से माँगना
ईश की है प्रेम डोर आत्मा को बाँधना ॥ धर्म कर्म…
प्रेम श्रद्धा भक्ति मन को प्रभु ही से जोड़ती
तुझको सत्य मार्ग की दिशा में ही मोड़ती
प्रभु की कर तू प्रार्थना स्तुति और उपासना
धर्म हित ही कर्म की, कर प्रभु से याचना ॥ धर्म कर्म..
स्तुत्य आत्मा केवल प्रभु का मार्ग खोजती
दूर अन्धकार कर जलाती ज्ञान ज्योति
संत ज्ञानी साधकों की सफल होती साधना
आत्मदीप जगमगाते शुद्ध होती आत्मा ॥ धर्म कर्म..
तर्ज: सर्व सर्व विसरू दे










