पशु पक्षी अपने बच्चे अपने समान सही जानते हैं

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पशु पक्षी अपने बच्चे अपने समान सही जानते हैं

पशु पक्षी अपने बच्चे
अपने
समान सही जानते हैं,
बिना बनाये मनुष्य के बच्चे
कभी मनुष्य नहीं बनते हैं।

जिस गृहस्थ में पति पन्ति
का उत्तम चरित्र होता है ।
उनके गर्म में आने वाला
जीव पवित्र होता हैं।।

अन्तर पट पर चित्रित
संस्कारों का चित्र होता हैं।
सुसंस्कारी जीव सदा जन-
जन का चित्र होता हैं।।
तीन शिक्षकों द्वारा सहायक
संस्कार यही बनते है।।1।।

एक माता और दूसरा पिता
तीसरा शिक्षक आचार्य हो।
इनके संरक्षण में मानवता
का पूर्ण कार्य हो,
वह सन्तान बड़ी भाग्यवान
जिसके माता-पिता आर्य हों ।
धार्मिक विद्वान माता-पिता-
गुरू की शिक्षा अनिवार्य हो।।

जिनको तीनों मिल जाये
सत्य समझो मनुष्य वही बनते हैं।।2।।

पांच वर्ष तक तत्परता से
माँ कर्तव्य निभाये जा।
अपनी उत्तम शिक्षा द्वारा
बच्चे को पनपाये जा ।।
सुसंस्कारो से कर संस्कृत
कुचेष्टा से बचाये जा।

जब तक पूरी शिक्षा न हो
सद उपदेश सुनाये जा ।।
विद्वान सभ्य सुशिक्षित
सन्तान के साधन यही बनते है ।।३।

माँ से बाद में छठे वर्ष से
पिता का नम्बर आता है,
उत्तम आचरण सद् व्यवहार
जीने की कला सिखाता है।
पात्र कुपात्र सत्य मिथ्या का
शिशु को ज्ञान कराता हैं,
दो शिक्षकों की शिक्षा पाकर
फिर गुरुकुल में जाता है।
क्यो न बने सन्तान ये शिक्षा के
ढंग जहां कहीं बनते हैं।।4।।

जिसको पाखंडियो के सब
हथकंडे समझा दिये जाये।
वह बालक धोखेबाजों के
चंगुल में फिर क्यों आयें ।।

माता पिता का कर्तव्य
कर्म परम धर्म यही कहलायें।
धन्य वह माता पिता है
जिनसे योग्य सुपुत्र जन्म पायें ।।
शोभाराम उत्तम संस्कारों
द्वारा महामही बनते हैं। ।5।।

वसो नगर की ओर यदि उरते हो
वन से घर छिपो यदि डरते हो
काले घन से छिप जाने को
जगह नही है दुनिया भर में
यदि कहीं डरते हो तुम
अपने ही मन से रक्त और
पसीने में बड़ा अन्तर है
पत्थर और नगीने में बड़ा अन्तर है

मुर्दा भेड़ो की तरह उम्र
बिताने वालो स्वांस लेने में
और जीने में बड़ा अन्तर है