सुनाये किसे कोई सुनता नहीं है (धुन-कव्वाली)
सुनाये किसे कोई सुनता नहीं है,
सुनता भी है तो वह गुणता नहीं है।
फैला करके नित्य वेदोक्त
इन विचारों को,
खिजाँ में चाहता हूँ
लाना फिर बहारों को।
यूँ ही झन्कार कर हृदय के
सूक्ष्म तारों को जगाना चाहता हूँ
सोये शुभ संस्कारों को।
जहाँ पर भी शुद्ध वातावरण की
अनुकूलता है,
वही संचित कर्म शुभ संस्कार
फलता फूलता है।
अंकुरित वही हो
जो भुनता नहीं है।। 1 ।।
सत्-रज् तम् तीन गुण की
चाल को जो जानता हैं
समझ लेता है सही जिस गुण की
भी प्रधानता है।
क्या करूँ क्या न करूँ
कर्तव्य को पहचानता है,
बुद्धि से निर्णय करे फिर
कर्म करना ठानता है।
मन में जो वही वचन में
जो वचन में वही कर्म में,
निरन्तर इस अभ्यास से
प्रवृत्ति होवे धर्म में।
ये मोती हीरे कोई
चुनता नहीं है।। 2 ।।
बुराइयों का तो दुर्जन
रात दिन प्रचार करते हैं।
इसी कारण बुराई को
ग्रहण नर-नार करते हैं।
वह वातावरण दूषित करके
दुर्व्यवहार करते. हैं।
ये सज्जन शुद्ध वातावरण
का इन्तजार करते हैं।
इस लिये जीवन का बेड़ा
गर्क होता जा रहा है।
स्वर्ग तो क्या विश्व सारा नर्क
होता जा रहा है।
उधेड़ें बहुत, कोई बुनता नहीं है।।3।।
धर्म का नाम लेते हैं
अधर्म के काम करते हैं।
ये कृत्रिम धर्म वाले,
धर्म को बदनाम करते हैं।
पापी तो छिपके करते हैं,
यह सरे आम करते हैं।
मिटायें औरों को,
खुद मिटने का इन्तजाम करते हैं।
सत्य धर्म प्रचार होवे,
केवल वैदिक मंच से
यह भी न छोड़ा अछूता,
द्वेष छल प्रपंच से।
प्रेमी यह धोखा,
निपुणता नहीं है।।4।।
चांदनी रात में बरसात बुरी लगती है
घर में लाश पड़ी हो तो बारात बुरी लगती है
दुनिया में चाहे खुशियाँ हजार हों दिल में दर्द हो
तो हर बात बुरी लगती है










