खुद से खुदी मिटाके (धुन-दिल में तुझे बसा के)
खुद से खुदी मिटाके,
सबको गले लगा के,
जीने का ढंग सिखा दो
भूलो को राह बता दो।
तन से मन से और वचन से
स्वस्थ्य समाज नहीं है।
बिना तुम्हारे और किसी
पै इसका इलाज नहीं है,
संजीवनी पिला के मुर्दो
को फिर जिला के।
ऋषियों को ऋणा चुका दो
भूलो को राह बतादो ।।1।।
है अफसोस तुम्हारे होते
पाखण्डी मुस्टन्डे।
लूट रहे हैं जन-जीवन
धन फैलाकर हथकन्डे ।।
प्रीति से या डराके पाखन्ड
से छुड़ा के।
सन्मार्ग पर लगा दो
भूलों को राह बता दो।।2।।
भिन्न-भिन्न रूपों के अन्दर है
ढोंगियों के आकर्षण।
कहीं ब्रह्मचर्य योग साधना
शिविर के हैं प्रदर्शन ।।
स्तुती प्रार्थना के,
ईश्वर उपासना के।
सब नियमों को जना दो,
भूलों को राह बतादो।।३।।
कहना-सुनना बहुत हो गया
अब करके दिखलाओ।
प्रेमी अपने देश की भूमि,
स्वर्ग समान बनाओं ।।
तुमको करोड़ो आंखें,
आशायें लेकर ताकें।
धीरज उन्हें बंधा दो
भूलो को राह बता दो।।4।।










