हम चेले उस ऋषिवर के जो थे सुधाकर जग भर के (धुन- मैं तुलसी तेरे आंगन की)
हम चेले उस ऋषिवर के।
जो थे सुधाकर जग भर के। । टेक ।।
उधर विरोधी जग के झमेले।
इधर महर्षिवर थे अकेले ।।
सच्चे उपासक ईश्वर के ।।1।।
आपत्ति अनगिन बाधायें।
राह में मिली बड़े त्रास दिखाये ।।
विचलित हुए नहीं डर के।।2।।
प्रभु की आज्ञा का संचालन।
समझा निज नित्य कर्त्तव्य पालन।
विरोधी थे आडम्बर के।।3।।
प्रेमी ऐष्णाओं से ऊपर
मुक्त आत्मा थे महर्षिवर ।।
हुए पार भव-सागर के।।4।।










