ऊपर को उठ उठकर अग्नि करती हमें इशारा।

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ऊपर को उठ उठकर अग्नि करती हमें इशारा।

ऊपर को उठ उठकर अग्नि करती हमें इशारा।

ऊपर को उठ उठकर
अग्नि करती हमें इशारा।
जीवन में ऊपर को उठना है
कर्तव्य हमारा ।।

उद्बुद्ध होते देख अग्नि को
हम भी उद्द्बुद्ध होवें।
अपनी जीवन ज्योति
जलाकर अंधकार को खोवें।
ऐसा जीवन होवे
जिसका वही सभी को प्यारा ।।

अग्नि में जो पड़े पदार्थ
अपना आप जलावे।
वही पदार्थ खुद जल करके
जग में सुगन्धित फैलावे।
सुगन्धित जीवन होवे
जिसका वही प्रभु को प्यारा ।।

जीना भी वह क्या जीना है
अपने लिए जो जीना।
जीवन सफल उसी का होवे
परहित में हो जीना।
परहित जीना पर हित
मरना यही है धर्म हमारा ।।

असफल मनुष्य वह है जो कर्म की बजाय भाग्य को प्रबल मानता है। कर्म करने से ही तो भाग्य बनता है। यदि कर्म ही न करोगे तो भाग्य क्या करेगा? -आचार्य चन्द्रशेखर