तन मन धन जीवन कण कण अर्पण

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तन मन धन जीवन कण कण अर्पण

तन मन धन जीवन कण कण अर्पण
सब आप करो निश दिन।
तब भी नहीं उतार सकोंगे
जीवन में माता का ऋण।।

माँ तो माँ क्या दूँ उपमा,
हर उपमा उप रह जाती है।
अनुपम-माँ-माँ की उपमा से
वाणी चुप रह जाती है।
अन्त में यह कह जाती है,
इस ऋण से उऋण होना है कठिन ।।1।।

गर्भ अवस्था में दस माह तक
बच्चे का निर्माण करै।
त्याग तपस्या साहस द्वारा
दुःखों से परित्राण करै।
उत्पन्न जब सन्तान करै,
संकट काटे पल पल गिन गिन। ।2।।

बच्चे की उन्नति में ही अपनी
उन्नति समझती है।
बच्चे की प्रगति मे ही
अपनी प्रगति समझती है।
माँ दुर्गति समझती है,
जीवन निष्प्रयोजन सुत बिन ।।३।।

कोई कसर नहीं रखती
सन्तान का पालन करने में।
परम सहायक माँ की
भक्ति भव सागर के तरने में।
प्रेमी फिर सेवा करने में
कैसी लज्जा कैसी घिन ।।4।।