निकटतम से निकट है
निकटतम से निकट है
ये रे ब्रह्ममीत ।
मुझ में प्रकृति में भरा
ब्रह्म गौरव गीत ।। टेक ।।
नेति नेति कर
अनन्त नापता जा,।
अनन्तानन्त ये
होगा ना अतीत ।। १ ।।
जितना तू गा ले,
जितना तू पा ले।
गुण-गण पराकाष्ठा
ब्रह्म अवीत ।। २ ।।
अरीति अन्धेरे हैं,
उजाले घनेरे।
इन पर ही चलकर
पहुंच ब्रह्म अरीत ।। ३ ।।
समय शून्य कर दे,
अरे ओ समयजित।
गति अनन्त तेरी
अव्याहत ओ ब्रह्ममीत ।। ४ ।।










