अब भारत काहे पछताय

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अब भारत काहे पछताय

टेक- अब भारत काहे पछताय,
लै बैठी तोहि तेरी करनी ।।
आप करै खोटी करनी
कलियुग को दोष लगाये।

याही ते मझधार में नाव
तेरी डूबी जाये ।।
विपत भैया नहीं टरनी ।। अब भा० ।।

जा माता ने जन्म दियो
और पाला दूध पिलाय।
ताहि छोड़ि पत्थर की
माता अपने ही हाथ बनाय ।।
समझि लीनी दुख हरनी ।।अब भा० ।।

जीयत मात पिता सों कबहूँ
बोलें नाहिं सिहाय ।
मरे पिछारी हंसी उड़ावें
मृतक श्राद्ध रचाय ।।
हाय तैने फारी धरनी ।। अब भा० ।।

साठ बरस के ब्याह रचावें
लेते मूंछ मुड़वाय।
बरना बनि मोटर में बैठे करे
कंकन बधवाय ।।
बरस उत छः को वरनी ।। अब भा० ।।

‘रूप’ कहें अब जाग-२
हम हारे तोहि जगाय।
बिछुड़े भये धर्म वैदिक
सों मिलियो कण्ठ लगाय ।।
पार तब होगी तरनी ।। अब भा० ।।