यह नर तन पिंजरा री

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यह नर तन पिंजरा री

यह नर तन पिंजरा री,
अनौखी हरे-हरे अनौखी सुनि सजनी।
हाड़ माँस में चुनकर पीछे
खून रंगों में कियौ।
त्वचा रूप कागज से कैसौ
पिंजरा मढ़ि है दीयौ।
करी अद्भुत करनी ।। यह०१

फेरि बनाई दस इन्द्री
जो अपनी राग सुना में।
पाँच कर्म करने में पैनी
पाँच ज्ञान बतला में।
नहीं जावै वरनी।। यह०२

ग्यारहवीं सबकी है
मुखिया बैठी हुकम चलावे ।
ताके विजय करत ही
प्राणी भवसागर तर जावै।
फेरि मुक्ति मिलनी। यह०३

त्वचा बतावै सर्दी-गर्मी
मुख से करिहैं वाद।
खान पान हूँ करे इसी
से जीभ बतावै स्वाद।
करी अंखियाँ लखनी ।। यह०४

शुद्ध सुनें कानों से,
कारज हाथ पांव से जानें।
गुदा आदि मल-जल को फेंकें
नाक गन्ध पहिचानें।
अनौखी सकल जनी।। यह०५