बिन विद्या दुर्गति होय
बिन विद्या दुर्गति होय,
हमारी हरे-हरे हमारी सुनि सजनी।
कहें पौराणिक पण्डित हम से
तुमको नही अंधकार।
शूद्र बतावत है हम सबको आप बनें
दातार-फटति नहीं है धरनी ।। बिन० १
बन्द कियौ हम सबकौ
पढ़ानौ कैसी बात बिगारी।
दिन-दिन मूर्ख होंय तभी
से दुःख भोगत हम भारी।
रह्यो न कोई विद्या कौ धनी ।। बिन० २
मदालसा पढ़ी थी इतनी
जाकौ पार न पायौ।
अपने सुत दोऊन को बाने
ब्रह्म-ज्ञान बतलायौ।
कथा में ऐसे सुनी।। बिन० ३
राम माता कौशल्या का था
नेम धर्म से जीता।
मन्त्रों से आहुति देती थी
हवन करै रोजाना।
रही प्रभु की शरनी।। बिन० ४
लीलावति ने अंकगणित की
पुस्तक एक बनाई।
जिसके प्रश्न गणित वालों
के छक्के देय छुड़ाई।
धन्य ताकी करनी ।। बिन० ५
कलावती ने अपने पति को
विद्या दई पढ़ाई।
लक्ष्मी देवी ने मितक्षरा
टीका दिया छपाई।
पढ़ी जाने कितनी ।। बिन० ६
कहा कहूँ मन्दोदरी, सीता,
द्रोपहि की चतुराई।
अनसूया ने जनक सुता को
नारि-नीति सिखलाई।
गई पति संग बनी।। बिन० ७
हमरौ पढ़नों बन्द करि
दियौ तिनको है धिक्कार।
अब तो बहिनों इन मूढ़न की
जिहा देउ पजारि।
कुमति जिन माँहि ठनी ।। बिन० ८










