साधक द्वारा प्रभु का धन्यवाद
साधक द्वारा प्रभु का धन्यवाद
हमने आनन्द पाया है
तेरा धन्यवाद प्रभु-२
१. सत्य अहिंसा का पालन करके।
चोरी जारी संग्रह तजके-
सदाचार बनाया है। तेरा……
२. आशा को मार के आसन जमाया।
तापों से तप के तन को तपाया-
मान अपमान भगाया है…..
३. प्राणायाम से प्राणों को रोका।
प्राणों से मन का नाता जोड़ा-
इन्द्रिय निग्रह बनाया है…..
४. हृदय में धारणा देश बनाया।
ध्यान से ध्येय का लक्ष्य बनाया-
मन से जप जपवाया है…
५. स्थिर मन में ज्योति जलाई।
बुद्धि में निश्चलता है समाई-
आनन्द आत्मा में पाया है…….
६. ईश दया से जीवन पाया।
गुरु कृपा से योग लगाया
‘दिव्य आनन्द पाया है।










