आजादी की दुल्हन मेरे
आजादी की दुल्हन मेरे,
कफन की चुनरी ओढ़े।
आयेगी माँ घर तेरे दिन
रह गए थोड़े ॥
हम इतने अंजान नहीं माँ,
इस जीने में शान नहीं माँ।
मातृभूमि की रक्षा करना,
फर्ज है ये एहसान नहीं माँ।
हक चाहते हैं भीख नहीं हम,
‘कर्मठ’ हाथ क्यों जोड़ें………..
मौत बनेगी मेरी दुल्हन,
है अभिशाप गुलामी का बन्धन।
रंग लाएगी कुर्बानी माँ,
हिल जाएगा ब्रिटिश शासन।
जन्म दुबारा लेकर के,
जंजीर सितम की तोड़ें.
सच माँ नहीं फांसी का डर है,
नाशवान देह जीव अमर है।
अब तो हथेली के ऊपर सिर है,
फिर मरने का हमें क्या डर है।
जालिम के कब तलक सहेंगे,
नंगे बदन पर कोड़े।
देश की खातिर मर जायेंगे,
मरकर भी फिर हम आयेंगे।
आकर के दुश्मन के ऊपर,
बम और गोली बरसायेंगे।
कसम मादरे हिन्द, फिरंगी को
जिन्दा नहीं छोड़ें……..










