कदर न जानी नर-तन की
कदर न जानी नर-तन की,
लगन लगी मन विषयन की।
तूं आशा शुभकर्म किया कर,
दुखियों के फटे दिल को सिया कर।
चर्चा हो तेरे गायन की लगन लगी
मन विषयन की।
सबसे उत्तम मानव चोला,
दिया प्रभु ने है अनमोला।
सार न जानी जीवन की
लगन लगी मन विषयन की।
मननशील हो मनुष्य कहाता,
धर्म के संग जो अर्थ कमाता।
जीत सके न तृष्णा मन की
लगन लगी मन विषयन की।
मैं ही हूं इस जग के अन्दर,
धन जोड़ा बन करके सिकन्दर।
खाल उतारी निर्धन की लगन लगी
मन विषयन की।










