मन मोड़ा फिर डर नहीं
मन मोड़ा फिर डर नहीं,
कोई दूर प्रभु का घर नहीं।
धीरे-धीरे मोड़ तूं इस मन को
इस मन को तूं इस मन को-2
जीत लिया मन फिर ईश्वर नहीं दूर,
जान बूझकर इंनसां क्यूं मजबूर।
अभ्यास से, वैराग्य से, कुछ भी है
दुष्कर नहीं कोई दूर प्रभु……..
मन लोभी मन कपटी मन है चोर,
कहते आए ये पल-पल में और।
बेईमान क्यूं नादान क्यूं, गफलत
ऐसे कर नहीं कोई दूर प्रभु…….
जप-तप-तीर्थ सब होते बेकार,
जब तक मन में रहते भरे विकार।
कुछ जानले पहचानले,
होना है विचलित नहीं कोई दूर प्रभु…….।










