यह दुनिया अरे पगले

0
35

यह दुनिया अरे पगले

यह दुनिया अरे पगले,
एक औम् कहानी है।
अपना न यहाँ कोई,
हर चीज बेगानी है॥

प्रभु नाम की शरण तूं ले,
वेदों की सच्चाई से।
जीवन की अगर नौका
उस पार लगानी है।

जब फूल-सा बचपन भी
कायम न रहा तेरा।
हर सांस यही कहता है,
दो दिन की जवानी है॥

क्यों मोह में आकर तूं,
खुद को ही भुला बैठा।
जो आया उसे जाना,
यह रीत पुरानी है।

श्रीकृष्ण से तेजस्वी,
अर्जुन से धनुर्धारी।
राणा की बता जग में,
क्या नामोनिशानी है।

शुभ कार्य हो साथी हैं,
सुख-दुःख में सदा तेरे।
दुनियां ने तो दुनियां की
दुविधा हो बढ़ानी है।