बाजी हार के जीवन की

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बाजी हार के जीवन की

बाजी हार के जीवन की,
जीत सका न तृष्णा मन की।

नत्थासिंह किस्मत जग जाए,
मन प्रभु चरणों में लग जाए।
जब हो कृपा उस भगवन् की-
जीत सका न तृष्णा मन की।

इच्छा के तारों पर नाचा,
मन के इशारों पर नाचा।
सूख गई रे नस-नस तन की
जीत सका न तृष्णा मन की।

मन दौलत को ललचाया,
दुनियाँ को में लूट लाया।
हुई झनकार झनाझन की
जीत सका न तृष्णा मन की।

तन पर रेशम पहनने को,
आभूषण से सजने को।
जो खाल उतारी निर्धन की
जीत सका न तृष्णा मन की।

पर ये अंधेरा दूर ना हुआ,
मन अब तलक न तेरा हुआ।
बूढ़े तन में हठ बचपन की
जीत सका न तृष्णा मन की।