तूं देख न उसको पाया

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तूं देख न उसको पाया

तूं देख न उसको पाया,
मन मन्दिर में ही समाया।
तूं रहता है जहाँ,
वो रहता है वहाँ,
कोई खोज न उसको पाया।

तेल तिल में बसे
पुष्प में वास है,
इस तरह वो सभी के
रहे पास है।
उसको देखता कहाँ
वो तो रहता है यहाँ,
हर कण-कण बीच समाया….।

विश्व रचता वहीं
तो पिता एक है,
देख रचना अजब बड़ी नेक है।
कैसी लीला रच दी सभी,
गलती होती ना कभी यह
विधिवत् जगत् रचाया…।

हर दिशा में बसे
ठोर खाली नहीं,
हर तरह का कोई
और माली नहीं।
कोई साथी ना सगा,
खुद ही रहता है लगा,
फिर क्यूं ना समझ में आया…।

क्यूं फिरे तूं भटकता
जगत् में अरे,
कष्ट पाता व्यर्थ खर्च
धन को करे।
कहाँ ढूंढ़ता नादान,
उसका दूर ना मकान,
वो व्यापक ब्रह्म कहलाया…।