क्या से क्या हो जाए सज्जन संग में।
अमीचन्द तज सुरा
सुन्दरी ऋषिवर वचन सुनाए।
पापपंक धो शुद्ध किया
मन हीरा बन दिखलाए ॥
पद्म-पत्र स्थित वारि
बिन्दु ज्यों मुक्ता रूप सुहाए।
स्वाति सीप पैठि सागर में
वो मोती बन जाए ॥
काला कुबड़ा भ्रमर
पुष्प कोअपना मीत बनाए।
वाही के संग में चढ़
देवन पर अपने मन इठलाए।
मलयगिरि के चन्दन
वन में तरुवर जो सरसाए।
चन्दन गंध सुगंध शीत
गुण अपने उर में बसाए।
नदियाँ नाले इधर-उधर
सों मैलों नीर बहाए।
जब गंगा मिल एक रूप
भये सुरसरि नाम धराए॥
धातु-कुधातु अयस लखि
निज तन मन ही मन सकुचाए।
पारसमणि को छुवत तनिक
सो सुवरन रूप दिखाए ॥
रजाकर नित पथिक
जनों को लूटे मार गिराए।
सन्तजनों के वचन सुने
ऋषि वाल्मीकि बन जाए ॥
अंगुलिमाल काट अंगुलिन को
अंगुलिमाल सजाए।
निर्जन वन चल आए
तथागत चरणन शीश झुकाए॥










