होवे दुनियां का उपकार

0
60

होवे दुनियां का उपकार

होवे दुनियां का उपकार
हवन के करने से-२

‘पृथ्वीसिंह’ तूने कविताई,
बिना स्वर और ताल सदा गाई।
फिर भी सफल प्रचार हवन के
करने से होवे दुनियां का……।

होती है शुद्ध पवन हवन से,
दुर्गन्धी भाग जाती भवन से।
हो न कोई बीमार हवन के
करने से होवे दुनियां का……।

अच्छी गन्ध जाती है खेत में,
कीचड़ में और जल में रेत में।
हो शुद्ध पैदावार हवन के
करने से होवे दुनियां का……।

ढूंढी नहीं मिले बीमारी,
वैद्य डाक्टर और पंसारी।
घूमें सब बेकार हवन के
करने से होवे दुनियां का……।

जल हो शुद्ध वायु-मण्डल में,
वर्षे वन उपवन जंगल में।
अन्न हो बेशुमार हवन के
करने से होवे दुनियां का…..।

सबकी अच्छी हो तन्दुरुस्ती,
किसी समय ना आवे सुस्ती।
हो आनन्द अपार हवन के
करने से होवे दुनियां का……।