बड़े भाग्य से मनुष्य देही मिली है

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बड़े भाग्य से (तर्ज चली….चली…. रे पतंग मेरी)

बड़े भाग्य से मनुष्य
देही मिली है
खा खा जूनियों की मार,
जीव हुआ लाचार,
चोट सीने पै चौरासी
लाख झिली है।
बड़े भाग्य……….

बना मकड़ी समान यहां आके।
फंस गया खुद जाल को बिछाके ।।
बन्दा एक काम कई,
निगाह नागपुर गई।
आप बैठा है बम्बई
दिल दिल्ली है।
बड़े मेरे बीस है मकान चार कारें।

लोग मुझे मिल मालिक पुकारें ।।
आठ ठेके सरकारी,
सात बेटे और नारी।

बारह कुत्ते हैं शिकारी
एक बिल्ली है।
बड़े भाग्य तू बता दे
कौन इनमें है तेरा।

चार दिन का है सराय में बसेरा ।।
तेरे बाद ये सामान किसी
और का ही जान।

काहे शेखियों में बना
शेखचिल्ली है।
बड़े भाग्य धनवान
होके इतना इतराया।

कहे मैंने ये दिमाग से कमाया।।
गर हो गया गरीब फिर
कहे वाह नसीब ।

कहे हाय! तकदीर
मेरी दिल्ली है।
बड़े भाग्य अन्त समय
शरमाया पछताया।

पाप कई पुण्य एक ना कमाया।।
यमराज खाता खोल,
जब कहेगा कि बोल।

बोल अब क्यों जबान
तेरी सिली है।
बड़े भाग्य नत्था सिंह
करे जैसा पाये।

फल देने वाला मुनसिफ कहाये ।।
तेरे पुण्य और पाप,
उन्ही का है प्रताप।
कली कर्मों की फूल
बनके खिली है।
बड़े भाग्य……….