ऋषि आते जो यहाँ

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ऋषि आते जो यहाँ

ऋषि आते जो यहाँ
न हम पार कैसे होते, पार…..

पढ़ने को वेद हमको
अधिकार कैसे होते, अधिकार….
जिंदा तो थे जहाँ में,
जीने का हक नहीं था।

हक अपना माँगने के
हकदार कैसे होते। हकदार….।
ऋषिवर………

पहने हुए थे पग में परतंत्रता के बेड़ी
पराधीनता के बेड़ी-2
सपने स्वतंत्रता के साकार कैसे होते-2। ऋषिवर…
मथुरा में जो गुरु की होती न मेहरबानी,
होती न कदरदानी।
कर्मठ उस देवता के दीदार कैसे होते-2।
ऋषिवर………

अगर ऋषिवर की बातों पर
जमाना चल गया होता

अगर ऋषिवर की बातों पर
जमाना चल गया होता-2
तो ये आँधी नहीं उठती
ये तूफाँ टल गया होता।

चमक उठता जमाने में
दुबारा वेद का सूरज
जहालत मिट गई होती
अंधेरा टल गया होता
कहीं मजलूम न रोते,
कहीं निर्दोष न मरते।

तबाही का जो आलम है,
वो सारा जल गया होता।
अगर ऋषिवर…

न मुर्झाती लताएँ फूल पत्ती
तना और कलियाँ लगाया
जो दयानन्द ने,
वो पौधा फल गया होता।

ना हम यूँ नाचते बेमोल,
गैरों के इशारों पर।
ना गौरव ही गया होता
न अपना बल गया होता।
अगर ऋषिवर…….

दिन को जिसे चैन न था न रात को आराम था।
दिल में एक दर्द लिए फिरता सुबह शाम था।
पथिक अपनी जान दे के जान हम में डाल गया,
उसका स्वामी दयानन्द सरस्वती नाम था।