यज्ञ से वायु व जलादि का शुद्ध होना कैसे सम्भव है?

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। विश्वानि देव सवितर्दुरितानी परा सुव। यद्भद्रन्तन्न आ सुव।। (यजु० ३०/३)

धर्म प्रेमी सज्जनों!

‘आर्य समाज निवाड़ी’ के सौजन्य से यह पाक्षिक पत्रक आपके हाथ में है। अपने धर्म, संस्कृति व राष्ट्र के विषय में, अपने सनातन साहित्य के विषय में, उनकी विषय वस्तु के विषय में यह पत्रक निरन्तर आप सबका मार्गदर्शन करता रहेगा। आप सभी के सहयोग की इस कार्य में महती आवश्यकता है। आप सभी इसे पढ़कर अपने अनुभवों एवं सुझावों से अवश्य अवगत कारयें। आप इसे अपने पास एक संकलन के रूप में भी रख सकते हैं ताकि आपके पास भी सनातन साहित्य और संस्कृति का एक अच्छा भंडार सुरक्षित हो सके। आज हम सब वैदिक / सनातन संस्कृति के विषय पर विचार करेंगे।

वैदिक / सनातन संस्कृति

संस्कृति शब्द मूलतः संस्कृत से ही जुड़ा है। (सम् + कृ + ति) अतः मनुष्य की श्रेष्ठ या उत्तम कृति (कर्म) ही संस्कृति है। जितना मनुष्य की चेष्टाओं का क्षेत्र विस्तृत है उतना ही विस्तृत संस्कृति का क्षेत्र है। भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृति है। यही वैदिक संस्कृति है। यही सनातन संस्कृति है। हमारे आदि ग्रन्थ वेद में स्वयं इसकी उद्घोषणा की गई है।

सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा।’ (यजुर्वेद – ७/१४)

न केवल काल की दृष्टि से अपितु अपनी उत्कृष्ट विशेषताओं के कारण भारतीय संस्कृति विश्व में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान

रखती है। यज्ञ परायणता, आध्यात्मिकता, वर्णाश्रम व्यवस्था, कर्मवाद, पुनर्जन्मवाद आदि ऐसी मूल भावनाएं हैं जिनके कारण भारतीय संस्कृति विश्व की महान्तम् संस्कृति कही जाती है। आज हम सब इस संस्कृति के प्रथम बिन्दु यज्ञ परायणता पर विचार करेंगे।

यज्ञ क्या है? महर्षि दयानन्द सरस्वती आर्योद्देश्यरत्नमाला में लिखते हैं कि, ‘जो अग्निहोत्र से लेके अश्वमेध पर्यन्त जो शिल्प- व्यवहार और जो पदार्थ विज्ञान है, जो की जगत के उपकार के लिए किया जाता है, उसको यज्ञ कहते हैं।’

यज्ञ सनातन संस्कृति का मुख्य आधार स्तम्भ है। मनुष्य के जीवन में गर्भाधान से लेकर जो नरमेध पर्यन्त १६ संस्कार हैं, वह बिना यज्ञ के प्रारम्भ नहीं होते। जब तक इस राष्ट्र में सनातन संस्कृति वैदिक सिद्धान्तों से पोषित रही तब तक इस राष्ट्र में अश्वमेध आदि वृहद यज्ञ होते रहे। वैदिक शास्त्रों में यज्ञ की महिमा का विस्तृत उल्लेख मिलता है। यथा- ‘यज्ञों वै श्रेष्ठतमं कर्मः ।’ यज्ञ संसार का सर्वश्रेष्ठ कर्म है। ‘यज्ञों वै कल्पवृक्षः’ यज्ञ सर्वकामनाओं को पूर्ण करने वाला है। ‘स्वर्ग कामो यजेत’ सुख प्राप्ति हेतु यज्ञ करो। ‘पुत्र कामेत यजेत’ पुत्र की कामना के लिए यज्ञ करो। ‘यजस्य प्रविता भवः’ तू यज्ञ का रक्षक बन। ‘अयज्ञियो हतवर्चा भवति’ यज्ञ ना करने वाले का तेज नष्ट हो जाता है। श्रीकृष्ण गीता में कहते है कि, ‘नायं लोकोस्त्ययज्ञस्य’ (गीता- ४/३१) अर्थात यज्ञ न करने वाला मनुष्य इस लोक में सुख नहीं पाता। प्रश्न – क्या होम करने के बिना पाप होता है?

महर्षि दयानन्द सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश में इसका उत्तर देते हुए कहते हैं, “हां, क्योंकि जिस मनुष्य के शरीर से जितना दुर्गंध उत्पन्न होकर वायु और जल को बिगाड़ कर रोगोत्पत्ति का निमित्त होने से प्राणियों को दुख प्राप्त कराता है उतना ही पाप उस मनुष्य को होता है। इसलिए उस पाप के निवारणार्थ उतना सुगन्ध वा उससे अधिक वायु और जल में फैलाना चाहिए।” आगे महर्षि लिखते हैं कि, “जब तक इस होम करने का प्रचार रहा तब तक आर्यावर्तत देश रोगों से रहित और सुखों से पूरित था अब भी प्रचार हो तो वैसा ही हो जावे।” (सत्यार्थ प्रकाश तृतीय समुल्लास )

यज्ञ से वायु व जलादि का शुद्ध होना कैसे सम्भव है?

देखो! अग्नि में जो पदार्थ डाला जाता है अग्नि उस पदार्थ को बहुत सूक्ष्म कणों में विभाजित कर देता है। पदार्थ जब अति सूक्ष्म हो जाता है तो यह ऊपर वायु में चला जाता है। अर्थात अग्नि उस पदार्थ के सूक्ष्म कणों को परमाणु के रूप में विभक्त करके वायु को पहुंचा देता है। इससे वायु का भी शुद्धिकरण हो जाता है। वायु से यह पदार्थ जल को प्राप्त होता है। इससे जल भी शुद्ध हो जाता है। और जब वर्षा होती है तो यही पदार्थ वापस पृथ्वी पर आकर अन्न और औषधीयों का शुद्धिकरण करते हैं। इससे सब जीवों को उपकार पहुंचता है। अतः यह यज्ञ संसार के सब जीवों के उपकारार्थ है। “भोपाल गैस त्रासदी में बचा कुशवाहा परिवार” यह घटना २-३ दिसंबर १९८४ की है। भोपाल में एक भयंकर गैस दुर्घटना हुई। गैस रिसाव के कारण चारों और अपरा तफरी मच गई। दम घुटने लगा, आंखों में खुजली होने लगी, खांसी होने लगी। इस घटना में लगभग २५००० लोगों की मौत हुई। जब सब लोग इस घटना से विचलित हो अफरा-तफरी में इधर-उधर भाग रहे थे, तो कुशवाहा परिवार ने धैर्य से काम लिया और अपने घर में तुरंत यज्ञ करना प्रारंभ किया देखते ही देखते इनका पूरा परिवार “मिथाइल आइसो सायनाइड गैस” से मुक्त हो गया। और यह परिवार सुरक्षित बचा रहा। ऐसा लाभकारी प्रभाव है इस यज्ञ का। यज्ञ में कौन-कौन से पदार्थ डालने चाहियें?

यज्ञ में चार प्रकार के पदार्थ डाले जाते हैं। केसर व कस्तूरी आदि सुगन्धियुक्त, घृत व दुग्ध आदि पुष्टिकारक, गुड व शक्कर आदि मिष्ट पदार्थ और सोमलता आदि रोगनाशक पदार्थ।

प्रश्न – एक बार किया हुआ हवन कब तक सुगन्धि देता है?

उत्तर – जो सन्ध्या काल में होम होता है वह हुत द्रव्य प्रातः काल तक वायु शुद्धि द्वारा सुखकारी होता है। जो अग्नि में प्रातः काल में होम किया जाता है वह हुत द्रव्य सायं कल पर्यन्त वायु शुद्धि द्वारा बल, बुद्धि और आरोग्यकारक होता है।

(सत्यार्थ प्रकाश तृतीय समुल्लास)

हमारे सभी महान पूर्वज दैनिक यज्ञ किया करते थे। भगवान श्री कृष्ण की यज्ञ के प्रति इतनी दृढ़ आस्था थी कि युद्ध काल में भी उन्होंने कभी दैनिक यज्ञ नहीं छोड़ा। इसलिए वे गीता में कहते हैं, “यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः” (३/१३) अर्थात् यज्ञ सब पापों से मुक्त करने वाला है। अतः मनुष्य मात्र को न्यून से न्यून १६ आहुतियां के द्वारा प्रतिदिन यज्ञ अवश्य करना चाहिए। इतना तो हम सबका दैनिक कर्तव्य है, इसके आगे जो हम यज्ञ करते हैं उसका हमें विशेष लाभ मिलता है। यदि कोई भाई-बहन यज्ञ विधि को ना भी जानता हो तो गायत्री मंत्र के द्वारा भी १६ अथवा २१ आहुतियां प्रतिदिन प्रातः एवं सायं दे सकता है। इससे हमारा घर, परिवार, वातावरण शुद्ध होता है, सात्विक भावनाएं जन्म लेती हैं, मस्तिष्क में उत्तम विचार उत्पन्न होते हैं, एवं परमपिता परमेश्वर का आश्रय प्राप्त होता है। इसलिए आओ हम सब संकल्प लें आज से हम सब अपने अपने घरों में सकारात्मक ऊर्जा के लिए, सकारात्मक विचारों के लिए, वातावरण की शुद्धि के लिए, ईश्वर आज्ञा पालन के लिए यज्ञ प्रारंभ करें।

“आर्य समाज निवाड़ी” प्रत्येक जिज्ञासु की सहायता एवं सहयोग करने के लिए सदैव तत्पर है। आप सभी किसी भी समय सहायता एवं सहयोग के लिए संपर्क कर सकते हैं।

यज्ञ विधि पत्रक भी जिज्ञासु “आर्य समाज निवाड़ी” से प्राप्त कर सकते हैं।

अगले पत्रक में हम सब वैदिक / सनातन संस्कृति के दूसरे अंग “आध्यात्मिकता” पर विचार करेंगे। आप सभी का बहुत-बहुत

धन्यवाद ।

ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः

आर्य कृष्ण शास्त्री ‘निवाड़ी’

प्रधान- आर्य समाज निवाडी, जनपद गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश)

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