मांसाहार वेदविरुद्ध

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🌹 मांसाहार वेदविरुद्ध🌹

ऋग्वेद-
आरे ते गोघ्नमुत पूरुषघ्नं क्षयद्वीर सुम्नमस्मे ते अस्तु।
मृव्ठा च नो अधि च ब्रूहि देवाधा च न: शर्म यच्छ द्विबर्हा: ।।-ऋग्वेद १ ।११४ ।१०


इस मन्त्र में आदेश दिया है कि ” हे शूरवीरों ! आपको चाहिये कि यत्नपूर्वक पुरुषों को मारने वाले तथा गौ आदि की हिंसा करने हारे पशुओं के विनाश करने वाले दुराचारियों से दूर रहे और उन दुष्टों का निवास भी दूर करावें।
राजा और प्रजा को चाहिये कि वे मिलकर सबकी रक्षा करें और परमार्थ का सुख भोंगे ।”

ये चार्वतो मांसभिक्षामुपासत उतो तेषामभिगूर्तिर्न इन्वतु ।।
अर्थात्-जो लोग प्राणी के मांस को तार्किक रीति से अभक्ष्य सिद्ध करते हैं ,हे ईश्वर ! उनकी सुगन्ध हम लोगों को भी प्राप्त हो।हे विद्वानों ! तुम मांस भक्षण को त्याग कर रोगों से बचे रहो।

य: पौरूषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधान:।
यो अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च ।।-ऋ० १० ।८७ ।१६

अर्थ-वे लोग जो मांस का भक्षण करते हैं और जो राक्षस असुर घोडों का मांस खाते हैं उन्हें राजा मृत्यु दण्ड दे।

दशस्यन्तो नो मरुतो मृव्ठन्तु वरिवस्यन्तो रोदसी सुमेके ।
आरे गोहा नृहा वधो वो अस्तु सुम्नेभिरस्मे वसवो नमध्वम् ।।-ऋग्वेद ७।५६।१७

अर्थ-वही राजा उत्तम हैं जो गौ-हत्यारों और मनुष्य हत्यारों को मारते हैं।श्रेष्ठ पुरुषों को सुख देकर दुष्टों का नाश करते हैं।

यजुर्वेद-

गां मा हिँ सीरदितिं विराजम्………”,
अर्थात् गायों को मत मारो बल्कि उनकी रक्षा करो सबको सुख प्राप्त हो।

इमम् सांहस्रम् शतधारमुत्सं व्यच्यमानं सरिच्यमानं सरिरस्य मध्ये।घृतं दुहानामदितिं जनायाग्ने मा हि सी: परमे व्योमन्। गवयमारण्यमनु ते दिशामि तेन चिन्वानस्तन्वो नीषीद।गवयं ते शुगृच्छतु यं द्विष्मस्तं ते शुगृच्छतु ।।

अर्थ-हे राजपुरुषों ! तुम लोगों को चाहिये कि जिन बैल आदि पशुओं के प्रभाव से खेती आदि काम,जिन गौ आदि से दूध घी आदि उत्तम पदार्थ प्राप्त होते हैं और जिनके दूध आदि से प्रजा की रक्षा होती है उनको मत मारो। जो जन इन उपकारी पशुओं को मारें उनको राजादि,न्यायाधीश अत्यन्त दण्ड देवें।

सामवेद-
सामवेद में भी कहा गया है कि-
सनादग्ने मृणासि यातुधानान् न त्वा रक्षांसि पृतनासु जिग्यु:।
अनु दह सहमूरान् कयादो मा ते हेत्या मुक्षत दैव्याया:।।-साम० १ । ८ । ८

अर्थ-हे प्रभु! आपने सदा ही दुष्ट , मांसाहारी राक्षसों को उनके द्वारा किए पापों का फल दिया है ताकि मानव जाति व समस्त जीव जन्तु सुखी रहें।

अथर्ववेद १९ । ३१ । १ मन्त्र में कहा गया है कि सभी श्रेष्ठ पुरुषों को चाहिये कि वे गौआदि सभी पशुओं का पालन,वृद्धि और रक्षा करें।इसी सूक्त के ७ वें मन्त्र में मनुष्यों को सब पशुओं और पुरुषों की रक्षा करने के आदेश दिये गये हैं और जीवों की आत्माओं को समान समझा गया है ऐसे में जीव हत्या का प्रश्न ही नहीं होता।

अथर्ववेद ८ । ६ । २३ मन्त्र में स्पष्ट उल्लेख है-
य आमं मांसमदन्ति पौरुषेयं च ये क्रवि:।
गर्भान् खादन्ति केशवास्तानितो नाशयामसि ।।

अर्थ-हे प्रभो ! हमें शक्ति दे कि हम उनका नाश कर सकें जो पशु-हत्या कर कच्चा या पका हुआ मांस खाते हैं।

👏महाभारत व गीता में अहिंसा-

रुपमव्यङ्गतामायुर्बुद्धिं सत्त्वं बलं स्मृतिम् ।
प्राप्तुकामैर्नरैहिंसा वर्जिता वै महात्मभि: ।। ९ ।।
जो सुन्दर रूप,पूर्णांगता,पूर्ण आयु,उत्तम बुद्धि,सत्त्व,बल और स्मरणशक्ति प्राप्त करना चाहते थे,उन महात्माओं ने हिंसा का सर्वथा त्यागकर दिया था।

अदृष्यं सर्वभूतानां विश्वास्य: र्वजन्तुषु।
साधूनां सम्मतो नित्यं भवेन्मांसं विवर्जयन् ।। १३ ।।

जो मनुष्य मांस का परित्याग कर देता है, वह सब प्राणियों में आदरणीय,
सब जीवों का विश्वसनीय और सदा साधुओं से सम्मानित होता है।

स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति ।
नास्ति क्षुद्रतरस्तस्मात्स नृशंसतरो नर: ।। १४ ।।
जो दूसरों के मांस से अपना मांस बढाना चाहता है, उससे बढकर नीच और निर्दयी मनुष्य दूसरा कोई नहीं है।

कान्तारेष्वथ घोरेषु दुर्गेषु गहनेषु च ।
अमांसभक्षणे राजन् भयमन्यैर्न गच्छति ।। २२ ।।


हे राजन् ! जो मनुष्य मांस नहीं खाता वह संकटपूर्ण स्थानों, भयंकर दुर्गों और गहन वनों में भी दूसरों से नहीं डरता।

अदृष्य: सर्वभूतानामायुष्मान् नीरुज: सदा।
भवत्यभक्षयन्मांसं दयावान् प्राणिनामिह ।। ३२ ।।

जो मनुष्य मांस नहीं खाता और संसार में सब प्राणियों पर दया करता है, वह सब प्राणियों में आदरणीय, सदा दीर्घायु और निरोग होता है।

भक्षयित्वापि यो मांसं पश्चादपि निवर्तते ।
तस्यापि सुमहान् धर्मों य: पापाद्विनिवर्तते ।। ३५ ।।


जो पहले मांस खाने के पश्चात् उसे छोड देता है,उसे भी बडे भारी धर्म की प्राप्ति होती है,क्योंकि वह पाप से निवृत हो गया है।

मां स भक्षयते यस्माद् भक्षयिष्ये तमप्यहम्।
एतन्मांसस्य मांसत्वमनुबद्ध्यस्व भारत ।। ५१ ।।

हे भारत ! (वध्य प्राणी कहता है~) ”आज मुझे वह खाता है,तो कभी मैं भी उसे खाऊंगा ”~यही मांस का मांसत्व है-यही मांस शब्द का तात्पर्य है।

सर्वयज्ञेषु वा दानं सर्वतीर्थेषु वाय्प्लुतम्।
सर्वदानफलं वापि नैतत्तुल्यमहिंसमा ।। ५६ ।।

सम्पूर्ण यज्ञों में दिया हुआ दान,समस्त तीर्थों में किया हुआ स्नान ,समस्त दानों का जो फल-यह सब मिलकर भी अहिंसा के बराबर नहीं हो सकता।

इन श्लोंको से स्पष्ट है कि महाभारत में हिंसा व मांसभक्षण पूर्णत: वर्जित था।
शान्तिपर्व में एक स्थान पर गौ को ‘ अघ्न्या ‘ कहा गया है अर्थात् गाय की हत्या करना सर्वथा वर्जित है।
आगे महाभारत में कहा गया है कि सब धर्मों में सबसे उत्कृष्ट और सबसे पवित्र और सत्यधर्म है -अहिंसा।


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