तीर्थ

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◼️तीर्थ ◼️


✍🏻 लेखक – स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी


🤔 प्रश्न-तीर्थस्नान से पाप का नाश और पुण्य की उत्पत्ति अथवा आत्मा की शुद्धि होती है वा नहीं?
🌹 उत्तर-पाप का नाश पुण्य की उत्पत्ति और आत्मा की शुद्धि का विचार तो पीछे करेंगे, प्रथम तीर्थ क्या है यही सोचना चाहिए।


🤔 प्रश्न-गंगादि जो अनेक पवित्र स्थान हैं वही तीर्थ हैं, इसको तो सब लोग जानते हैं। इसमें सोचने की कौन सी गुह्य बात है?
🌹 उत्तर-इतना तो ठीक है, साधारण लोग गङ्गादि स्थानों को तीर्थ कहते हैं, किन्तु सोचने की बात यह है, कि ये स्थान वास्तव में तीर्थ हैं वा नहीं? और धर्म-पुस्तकों में इनको तीर्थ लिखा भी है वो नहीं ?


🤔 प्रश्न-क्या लोग बिना लिखे ही कहते हैं ? पुराणों में, महाभारत में तीर्थों का वर्णन है। वेद में तीर्थ शब्द आता है, अतः यह निर्विवाद विषय है। इस पर सोचने की आवश्यकता नहीं है। हाँ पाप-नाश और पुण्य उत्पत्ति की बात कहो।


🌹 उत्तर-वह भी कहेंगे, किन्तु प्रथम तो तीर्थ ही चिन्तनीय है, क्योंकि तीर्थ शब्द के अर्थ हैं, जिसके द्वारा लोग तर जाएं। क्या गंगादि स्नान से वा गंगा से ही लोग तर जाते हैं ? देखा तो यह जाता है, यदि किसी को तैरना न आता हो, वह किसी समय गंगा के गहरे जल में पड़ जाए तो डूब जाता है। और गंगास्नान से भी पाप का नाश और पुण्य की उत्पत्ति प्रतीत नहीं होती। इसलिए न तो यह तीर्थ है और न ही गंगा आदि स्नान से पाप का नाश और पुण्य की उत्पत्ति होती है। इसी कारण मनुस्मृति में मनु जी ने साफ लिखा है।
🔥 अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ।
-मनु ५।१०९
जल के स्नान से शरीर शुद्ध होता है, मन सत्य बोलने, सत्य व्यवहार से शुद्ध होता है, विद्या और तप से आत्मा शुद्ध होता है बुद्धि यथार्थ ज्ञान से शुद्ध होती है।
मनु जी ने इस श्लोक में स्नान से शरीर के बाह्य अवयवों की शुद्धि लिखी है, आत्मा की शुद्धि के कारण विद्या और तप ही बताये हैं। आप गंगादि स्नान से आत्मा की शुद्धि कहते हैं, सो बात ठीक नहीं है। जो मनुस्मृति में लिखा है, वही युक्तियुक्त और ठीक है।
आपने कहा था कि महाभारत में तीर्थ का वर्णन है सो महाभारत में ऐसा लेख है, जब महाभारत युद्ध समाप्त हो गया, भीष्मपितामह जी शरशय्या पर विराजमान थे। उस समय श्री कृष्ण जी की सम्मति से पाण्डव उनकी सेवा में गये, वहाँ जाकर युधिष्ठिर जी ने भीष्मपितामह जी से अनेक विषयों के प्रश्न पूछे थे, उन प्रश्नों के भीष्मपितामह जी ने जो उत्तर दिये थे, वह महाभारत के अनुशासन पर्व में लिखे हुए हैं। वहाँ तीर्थ विषयक भी एक प्रश्न का उस समय भीष्म जी ने जो उत्तर दिया था, उसमें से कुछ श्लोक यहाँ लिखते हैं, जिससे महाभारत में तीर्थ विषयक सिद्धान्त का पता लग जाएगा।
युधिष्ठिर उवाच


🔥 यद्वरं सर्वतीर्थानां तन्मे ब्रूहि पितामह।
यत्र चैव परं शौचं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥१॥
युधिष्ठिर जी ने कहा-हे पितामह सब तीर्थों में जो श्रेष्ठ है और जो उत्तम शौच, अर्थात् पवित्रता होती है, वह आप मुझे बतलायें।
भीष्म उवाच-
🔥 सर्वाणि खलु तीर्थानि गुणवन्ति मनीषिणाम्।
यत्तु तीर्थं च शौचं च तन्मे शृणु समाहितः ॥ २ ॥
सब तीर्थ मनीषियों के लिए गुणवान् हैं, उनमें जो पवित्र तीर्थ है। वह समाहित होकर सुन।
🔥 अगाधे विमले शुद्धे सत्यतोये धृतिहदे।
स्नातव्यं मानसे तीर्थे सत्यमाश्रित्य शाश्वतम् ॥ ३॥
🔥 तीर्थं शौचमनर्थित्वमार्जवं सत्त्वमार्दवम्।
अहिंसा सर्वभूतानामानृशंस्यं दमः शमः ॥ ४॥
🔥 निर्ममा निरहङ्कारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहा।
शुचयस्तीर्थभूतास्ते ये भैक्ष्यमुपभुञ्जते ॥ ५ ॥


गम्भीर, दोषरहित, पवित्र सत्यरूपी जल और धैर्य रूपी तालाब युक्त मानस तीर्थ में शाश्वत सत्य का अवलम्बन करके स्नान करना चाहिए। (अनर्थत्वं) किसी को अर्थी न होना, (आर्जवं) सरलता, (मार्दवं) नरमचित्त, सब जीवों की अहिंसा, अनृशंसता और शम (मन को वश में रखना) दम (इन्द्रिय दमन करना) ही पवित्र तीर्थ हैं।
जो लोग ममतारहित, निरहंकारी, अर्थात् अहंकार शून्य, सुख, दु:ख, शीत, आतप आदि द्वन्द्व सहन करनेवाले और निष्परिग्रह, अर्थात् संग्रह रहित, दानादि के लालच से रहित हैं और जो लोग भिक्षा धन से जीवन व्यतीत करनेवाले संन्यासी हैं, वे ही पवित्र तीर्थरूप हैं।
इस प्रकरण में भीष्म जी ने आपके कहे गंगादि स्नान को कहीं तीर्थ नहीं बताया है। उसके विपरीत सत्य, धैर्घ्य, निर्लोभतो, सरलता, नम्र चित्त, अहिंसा, दया, शम, दम, ममतारहित, अहंकार वर्जित, द्वन्द्वों के सहन करनेवाले तपस्वी और भिक्षा से निर्वाह करनेवालों को ही तीर्थ बताया है। इससे सिद्ध है कि वास्तव में यही सच्चे तीर्थ हैं। जो मनुष्य को पवित्र करनेवाले हैं, यही वे तीर्थ हैं, जिनके सेवन से मनुष्य संसार-सागर से तर जाता है, गंगादि तीर्थ तो स्वार्थी लोगों ने साधारण प्रजा को ठगने के लिए बना लिये हैं और ये गंगादि तीर्थ तारनेवाले तो किसी अवस्था में भी नहीं होते हैं।
उसी प्रकरण में स्नान के विषय में भी भीष्म जी ने कहा है।


यथा-
🔥 नोदकक्लिन्नगात्रस्तु स्नात इत्यभिधीयते।
स स्नातो यो दमस्नातः स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
🔥 मनसा च प्रदीप्तेन ब्रह्मज्ञानजलेन च।
स्नाति यो मानसे तीर्थे तत्स्नानं तत्त्वदर्शिनाम्॥
(महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय १०८)
जल से स्नान करनेवाले मनुष्य को स्नान (स्नान किया हुआ) नहीं कहते हैं। जो लोग दमस्नात हैं उन्हीं ने स्नान किया है और वे ही बाहर तथा भीतर पवित्र होते हैं।
ज्ञान से निर्मल किये हुए मन और ब्रह्म ज्ञान के जल के सहारे जो लोग मानस तीर्थ में स्नान करते हैं, उनका नहाना ही स्नान है। तत्त्वदर्शियों को ऐसा ही स्नान अभिमत है।
यहाँ भीष्मपितामह जी ने जल स्नान से आत्मशुद्धि का सर्वथा ही निषेध किया है, अतः जलादि के स्नान से मनु जी के लिखे अनुसार केवल शरीर की शुद्धि होती है। आत्मशुद्धि के लिए जल स्नान का कोई प्रयोजन नहीं है।


🤔 प्रश्न-यदि महाभारत में इस प्रकार निषेध है तो लोग गंगादि तीर्थों में स्नान करने क्यों आते हैं ? और पण्डे तीर्थों पर रहते हैं और वे बाहर जाकर तीर्थों का प्रचार भी करते हैं। क्या वे महाभारत नहीं पढ़े हैं?
🌹 उत्तर-महाभारत तो वे पढ़े हैं, परन्तु उन्हें तीर्थ स्नान करनेवालों को तीर्थ का माहात्म्य बताकर बहकाना है और उनका धनहरण करके अपनी जीविका चलानी है। और इसलिए वे तो स्वार्थी हैं, उनका कथन प्रमाण नहीं है।


🤔 प्रश्न-किसी आचार्य्य ने तीर्थ विषयक कुछ लिखा है ?
🌹 उत्तर-हाँ लिखा है।


🤔 प्रश्न-वह बतलाओ, क्या लिखा है?
🌹 उत्तर-महर्षि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में तीर्थ विषयक निम्न पाठ लिखा है-और ये तीर्थ (प्रथम भारतवर्ष में) नहीं थे, जब जैनियों ने गिरनार, पालिटाना शिखर शत्रुञ्जय और आबू आदि तीर्थ बनाये। उनके अनुकूल इन लोगों ने भी बना लिये। जो कोई इनके आरम्भ की परीक्षा करना चाहे, वे पण्डों की पुरानी से पुरानी बही और तांबे के पत्र आदि लेख देखें तो निश्चय हो जाएगा कि ये सब तीर्थ पांच सौ अथवा एक सहस्र वर्ष से इधर ही बने हैं, सहस्र वर्ष से उधर का लेख किसी के पास नहीं निकलता, इससे आधुनिक हैं।


🤔 प्रश्न-जो जो तीर्थ का माहात्म्य, अर्थात् 🔥 ‘अन्यक्षेत्रे कृतं पापं काशीक्षेत्रे विनश्यति।’ इत्यादि बातें हैं, वे सच्ची हैं वो नहीं ?
🌹 उत्तर-नहीं, क्योंकि यदि पाप छूट जाते हों तो दरिद्रों को धन, राजपाट, अन्धों को आँखें मिल जातीं, कोढ़ियों का कोढ़ आदि रोग छूट जाता, ऐसा नहीं होता, इसलिए पाप वा पुण्य किसी का नहीं छूटता।।


🤔 प्रश्न-🔥 गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥ जो सैकड़ों सहस्रों कोस दूर से भी गंगा-गंगा कहे तो उसके पाप नष्ट हो कर वह विष्णु लोक, अर्थात् वैकुण्ठ को जाता है। क्या झूठ हो
जाएगा?


🌹 उत्तर-मिथ्या होने में क्या शङ्का?, क्योंकि गङ्गा…….नाम स्मरण से पाप कभी नहीं छूटता, जो छूटे तो दु:खी कोई न रहे और पाप करने से कोई भी न डरे। वैसे आजकल पोपलीला में पाप बढ़कर हो रहे हैं। मूढ़ों को विश्वास है कि हम…….तीर्थयात्रा करेंगे तो पापों को निवृत्ति हो जाएगी। इसी विश्वास पर पाप करके इस लोक और परलोक का नाश करते हैं, परन्तु किया हुआ पाप भोगना ही पड़ता है।


🤔 प्रश्न-तो कोई तीर्थ…….सत्य है वा नहीं?
🌹 उत्तर-है, वेदादि सत्यशास्त्रों का पढ़ना, पढ़ाना, धार्मिक विद्वानों का संग, परोपकार, धर्मानुष्ठान, योगाभ्यास, निर्वैर, निष्कपट, सत्यभाषण, सत्य का मानना, सत्य करना, ब्रह्मचर्य्य, आचार्थ्य, अतिथि, मातापिता की सेवा करना, परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना, शान्ति, जितेन्द्रियता, सुशीलता, धर्मयुक्त, पुरुषार्थ, ज्ञान, विज्ञान आदि शुभ गुण, कर्म दुःखों से तारनेवाले होने से तीर्थ हैं। और जो जलस्थलमय हैं। वे तीर्थ कभी नहीं हो सकते, क्योंकि 🔥 ‘जना यैस्तरन्ति तानि तीर्थानि’ मनुष्य जिसे करके दुःखों से तरें उनका नाम तीर्थ है। जलस्थल तरानेवाले नहीं, किन्तु डुबोकर मारनेवाले हैं।


🌺 पूर्वपक्षी-महर्षि दयानन्द जी का लेख सुनकर तो अब पूरा-पूरा निश्चय हो गया कि गङ्गादि तीर्थ केवल पोपों के बनाये हुए हैं। आगे को मैं भी जैसा महर्षि ने उपदेश किया है, वैसा करने का यत्न करूंगा।(‘‘वेदपथ” से साभार)


✍🏻 लेखक – स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी
साभार – राजेंद्र जिज्ञासु जी (पुस्तक – वैदिक विचारधारा)
प्रस्तुति – 📚 अवत्सार
॥ ओ३म् ॥

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