सच्चे शिव की खोज – महर्षि दयानंद

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सच्चे शिव की खोज

(महाशिवरात्रि एवं ऋषि बोध उत्सव के अवसर पर प्रकाशित)

आज बोध दिवस शिवरात्रि का पावन पर्व ज्ञान, भक्ति और उपासना का दिवस है। शिवरात्रि के तीसरे प्रहर में 14 वर्षीय बालक मूलशंकर के हृदय में सच्चे शिव को पाने की अभिलाषा जगी थी। शिव’ विद्या और विज्ञान का प्रदाता स्वरूप है परमात्मा का। इसी दिन मूलशंकर को बोध-ज्ञान प्राप्त हुआ था और वह महर्षि दयानन्द सरस्वती बन सके। इस दिन को याद करते हुए दयानंद बोध दिवस के रूप में हर साल मनाया जाता है। शिवरात्रि का अर्थ है वह कल्याणकारी रात्रि जो विश्व को सुख, शांति और आनंद की प्राप्ति कराने वाली है। मनुष्य के जीवन में न जाने कितनी शिवरात्रि आती हैं। किन्तु उसे न ज्ञान होता है और न परमात्मा का साक्षात्कार, न उनके मन में सच्चिदानंद परमात्मा के दर्शन की जिज्ञासा ही उत्पन्न होती है। बालक मूलशंकर ने अपने जीवन की प्रथम शिवरात्रि को शिव मंदिर में रात्रि जागरण किया। सभी पुजारिओं और पिता जी के सो जाने पर भी उन्हें नींद नहीं आई और वह सारी रात जागते रहे। अर्ध रात्रि के बाद उन्होंने शिव की मूर्ति पर नन्हे चूहे की उछल कूद करते व मल त्याग करते देखकर उनके मन में जिज्ञासा हुई की यह तो सच्चा शिव नहीं हो सकता। जो शिव अपनी रक्षा खुद ना कर सके वो दुनिया की क्या करेगा और उन्होंने इसका उत्तर अपने पिता व पुजारिओं से जानना चाहा लेकिन संतोषजनक उत्तर न मिल पाने के कारण उन्होंने व्रत तोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने 21 वर्ष की युवा अवस्था में घर छोड़ कर सच्चे शिव की खोज में सन्यास लेकर दयानंद बने व मथुरा में दण्डी स्वामी विरजानन्द जी के शिष्य बनने हेतु पहुंचे। शिष्य को गुरू और गुरू को चिर काल से अभिलषित शिष्य मिल गया। तीन वर्ष तक कठोर श्रम करके वेद, वेदांग, दर्शनों का अंगों उपांगों सहित अध्ययन किया और गुरु दक्षिणा के रूप में स्वयं को देश के लिए समर्पित कर दिया ।

महर्षि दयानंद सरस्वती

जिन सच्चे शिव की खोज में दयानन्द घर से निकले थे। उनकी पिपासा वेदों को साक्षात् कर धर्म अनुसार आचरण करने से तृप्त हुई। शिव तथा शिव के जितने भी पर्यायवाची शब्द- शम्भु, शंकर, मयस्कर, मयोभव आदि हैं, उन सबका अर्थ कल्याण, सुख ही है। उन्होंने उपदेश दिया कि जो विद्या पढ़ के धर्माचरण करता है। वही सम्पूर्ण सुख को प्राप्त होता है। निश्चय जानों कि वह अधर्माचरण धीरे-धीरे तुम्हारे सुख के मूल को काटता चला जाता है। धर्म का फल सुख और इसी भावना से यह मूल-मन्तव्य निर्दिष्ट किया है कि हमारे जीवन के हर क्षेत्र का प्रत्येक कार्य धर्म के ही अनुसार हो। वस्तुतः शिव का रहस्य, मर्म या मार्ग धर्म का आचरण ही है। धर्म शब्द ‘धृ’ से बनता है। जिसका अर्थ है धारण अर्थात् जिसके धारण, पालन से सुख प्राप्त हो। धर्म का ईश्वर भक्ति एक प्रमुख तत्त्व है और ईश्वर आनन्द, सुख, कल्याण का खजाना है। हां, परमात्मा का मुख्य स्वरूप कर्म फल देना ही है। शेष सारे गुण इसी के अन्दर आ जाते हैं। अतः अच्छा फल प्राप्त करने के लिए अच्छे कर्म-धर्म का आचरण ही एक मात्र सुख का आधार है।

महर्षि दयानंद सरस्वती

जैसे कि धर्म अच्छाई है, इस पर स्थिर रहने के लिए ही हम धर्म ग्रन्थ पढ़ते है, सत्संग करते है। इसीलिए मनु जी ने धृति, क्षमा, संयम, सच्चाई आदि दस बातों को धर्म कहा है। जो कि आचरण, अच्छाई की ही बातें हैं। इनको पालने से ही जीवन, परिवार, समाज सुखी होता है। धर्म के जितने भी अर्थ मिलते हैं, उनका असली आधार आचरण ही है। स्वामी जी ने निर्देश दिया कि जो धर्म को समझना चाहते हैं। वे वेद द्वारा ही धर्म का निश्चय करें, क्योंकि धर्म अधर्म का निश्चय बिना वेद के ठीक-ठीक नहीं होता। वेदों में शिव की महिमा के अनेक प्रसिद्ध मंत्र है। त्र्यम्बकं यजामहे महामृत्युंजय मन्त्र में प्रार्थना है कि विविध ज्ञान भण्डार, विद्यात्रयी के आगार, सुरक्षित आत्मबल के वर्धक परमात्मा का यजन करें। जिस प्रकार पक जाने पर खरबूजा अपनी बेल से स्वतः ही अलग हो जाता है वैसे ही हम इस मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो जायें, मोक्ष से न छूटें। संध्या के प्रसिद्ध मन्त्र नमः शम्भवाय च में प्रेरणा है कि जो मनुष्य सुख को प्राप्त कराने हारे परमेश्वर और सुख प्राप्ति के हेतु विद्वान् का भी सत्कार कल्याण करने और सब प्राणियों को सुख पहुंचाने वाले का भी सत्कार मंगलकारी और अत्यन्त मंगल स्वरूप पुरुष का भी सत्कार करते हैं, वे कल्याण को प्राप्त होते हैं। वेदों के प्रसिद्ध रुद्र सूक्त में ईश्वर को दुष्टों के भय देने वाला और श्रेष्ठों को सुख देने वाला बताया गया है। रोगनाशक वैद्य के रूप में रोगों को दूर करने वाला बताया गया है।

शिव

महर्षि ने वेदों के माध्यम से सच्चे शिव को साक्षात् किया। यही ईश्वरीय प्रेरणा उन्हें महापुरुष की कोटि में शामिल करती है। उनके जीवन का हर पहलु संतुलित और प्रेरक था। एक श्रेष्ठ मनुष्य का जीवन कैसा होना चाहिए। वे उसके प्रतीक थे। उनकी जिंदगी की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था। इस लिए उनके संपर्क में जो भी आता था, प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था। वे प्रतिदिन आत्म-कल्याण के लिए ईश्वर का ध्यान करते थे। इसका ही परिणाम था कि बड़े से बड़े संकट के समय वे न घबराए और न तो कभी सत्य के मार्ग से पीछे हटे। समाज को हर बुराई, कुरीति, पाखण्ड एवं अंधविश्वास से मुक्ति दिलाने के लिए डट कर सत्य बातों का का प्रचार-प्रसार किया। उनकी तप, साधना व सच्चे ज्ञान ने समाज को एक नई दिशा दी। यदि मानव को सच्चे ईश्वर की प्राप्ति चाहिए तो उसे महर्षि दयानंद जी के मार्ग पर चलते हुए उनकी शिक्षाओं एवं ज्ञान को अपने जीवन में धारण करना ही होगा। महर्षि दयानंद जी के चरणों में सहस्रों बार साष्टांग नमन। शिव रात्रि का यही पावन सन्देश है।

डॉ विवेक आर्य

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