‘ओम् जय जगदीुश हरे’ के रचयिता कौन हैं ?

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‘ओम् जय जगदीश हरे’ के ‘ओम् जय जगदीश हरे’ के रचयिता कौन हैं ? कौन हैं ?

इस भजन के रचयिता थे पं. श्रद्धाराम शर्मा उर्फ श्रद्धाराम फिल्लौरी। ऋषि दयानंद जी की प्रेरणा से उन्होंने निराकार परमात्मा ‘ओम्’ की स्तुति प्रार्थना में यह भजन लिखा था। पौराणिक बन्धु इसे मूर्तियों के पूजा अर्चना करते समय आरती के रुप में गाने लगे। पं. श्रद्धाराम शर्मा का जन्म पंजाब के जिले जालंधर में स्थित फिल्लौर नगर में हुआ था। वे सनातन धर्म प्रचारक, ज्योतिषी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, संगीतज्ञ तथा हिन्दी और पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार थे। उन्होनें 1877 में भाग्यवती नामक एक उपन्यास लिखा था जो हिन्दी में था।माना जाता है कि यह हिन्दी का पहला उपन्यास है। इस उपन्यास का प्रकाशन 1888 में हुआ था। पं.श्रद्धाराम ने 1870 में एक ऐसा भजन लिखा आरती जो भविष्य में घर घर आरती के रुप में गाया जाने लगा। 24 जून 1881 को लाहौर में पं.श्रद्धाराम शर्मा ने आखिरी सांस ली। निराकार ईश्वर की भक्ति का यह भजन इस प्रकार है-

ओम् जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।

भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे।

ओम् जय जगदीश हरे….

जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का,स्वामी दुःख विनसे मन का।

सुख सम्पति घर आवे,सुख सम्पति घर आवे,कष्ट मिटे तन का।

ओम् जय जगदीश हरे……

मात पिता तुम मेरे,शरण गहूं किसकी, स्वामी शरण गहूं मैं किसकी।

तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा,आस करूं मैं जिसकी।

ओम् जय जगदीश हरे…..

तुम पूरण परमात्मा,तुम अन्तर्यामी,स्वामी तुम अन्तर्यामी,

पारब्रह्म परमेश्वर,पारब्रह्म परमेश्वर,तुम सब के स्वामी।

ओम् जय जगदीश हरे……

तुम करुणा के सागर,तुम पालनकर्ता,स्वामी तुम पालनकर्ता।

मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी,कृपा करो भर्ता।

ओम् जय जगदीश हरे…….

तुम हो एक अगोचर,सबके प्राणपति,स्वामी सबके प्राणपति।

किस विधि मिलूं दयामय,किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति।

ओम् जय जगदीश हरे…..

दीन-बन्धु दुःख-हर्ता,ठाकुर तुम मेरे,स्वामी रक्षक तुम मेरे।

अपने हाथ उठाओ,अपने शरण लगाओ,द्वार पड़ा तेरे।

ओम् जय जगदीश हरे…..

विषय-विकार मिटाओ,पाप हरो देवा,स्वामी पाप हरो देवा।

श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,सन्तन की सेवा।

ओम् जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे! ……………….. ….

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