पं० नरेन्द्र, (हैदराबाद)
संयोजक : आर्यसमाज स्थापना शताब्दी समिति
आर्यसमाज स्थापना दिवस के इस पवित्र अवसर पर मैं आर्यसमाज संस्थापक पुण्य श्लोक महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती को कृतज्ञता पूर्वक श्रद्धांजलि अर्पित करता है और उन महानुभावों का भी स्मरण करता है जिन्होंने आर्यसमाज के प्रसार और उस की यशःवृद्धि में योग दे कर समाज के आदशों की रक्षा निमित्त साहसपूर्वक अनेक कष्टों का सामना कर निष्काम भाव से आत्मोत्सर्ग किया है। उन महापुरुयों की तपस्या का ही परिणाम है कि आर्यसमाज अपने कार्यों द्वारा न केवल विश्व जीवन को शान्ति और संजीवनी शक्ति देता रहा है अपितु वह सभी समुदायों द्वारा मान और सम्मान भी प्राप्त करता रहा है।
आर्यसमाज स्थापना शताब्दी के इस मांगलिक अवसर पर समाज संस्थापक सर्व कल्याण कारक महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती का स्मरण करना प्रत्येक आर्य का पुनीत कर्तव्य है। महर्षि का व्यक्तित्व और कृतित्व इतना महान् है कि वह यावच्चन्द्र दिवाकरी चिरस्मरणीय रहेगा ।
महर्षि दयानन्द सरस्वती ने १८७५ ई० में बम्बई नगर में आर्यसमाज स्थापना करके एक प्रकार से धर्म प्रचारक संघ की नींव रखी थी। यह संघ आडम्बर से अछूता और समाज सुधार का पोषक था। आर्यसमाज की स्थापना के माध्यम से महर्षि ने निश्चित ही मानवमात्र में नूतन जीवन एवं जागृति उत्पन्न करने का अमोघ साधन प्रस्तुत किया था। महर्षि दयानन्द द्वारा गठित इस समाज द्वारा वैदिक धर्म की मर्यादा और उसकी गौरव गरिमा अक्षुण्ण रह सकी है।
दयार्द हृदय दयानन्द ने विश्व प्रेम और लोकहित की भावना से प्रेरित होकर लोगों को आर्यसमाज में प्रविष्ट होने के लिए प्रेरित किया और सावधान किया कि आर्यसमाज के अतिरिक्त अन्य किसी समाज से उनका हित सम्पादन न होगा। महर्षि का विश्वास था कि आर्यसमाज में कालान्तर में ऐसे कर्मठ व्यक्ति उत्पन्न होंगे जो कि आदर्शों की रक्षा तथा उस के निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति में प्राण प्रण से जुट जायेंगे। महर्षि का स्वप्न साकार हुआ, इतिहास इसका साक्षी है। दूरदर्शी दयानन्द का वह कथन जिसमें कहा गया था कि आर्यसमाज रूपी वाटिकाएँ हरी भरी, फूली फली लहलहाती दिखाई देंगी। प्रभु कृपा से यह सब कुछ होगा परन्तु मैं न देख सकूंगा, सर्वथा सत्य सिद्ध हुआ है।
आज आर्यसमाज के सामने अनेक कार्य हैं। उनके कार्यों में सब से बड़ा कार्य वैदिक विचारधारा एवं वैदिक संस्कृति का अधिकाधिक प्रचार और प्रसार करना, विरोधी तत्त्वों का उपशमन कर वैदिक धर्म का मार्ग प्रशस्त करना और जड़वाद की विभीषिका से मानव मात्र की रक्षा कर संसार को विनाश के गर्त में गिरने से बचाना है। भोगवाद और वैदिक आध्यात्मवाद का समन्वय कर सुख और शान्तिं की स्थिति उत्पन्न करना भी आर्यसमाज का हो कार्य है, जिसके लिए भोगवाद से तंग आकर सारा संसार छटपटा रहा है।
भगवान बुद्ध ने अपनी लोकहित की योजना में सदाचार को रखा था किन्तु परमात्मा को उसमें स्थान नहीं दिया था। भगवान शंकर ने अपनी योजना में परमात्मा को तो स्वीकार किया किन्तु संसार को महत्त्व नहीं दिया था। परिणामतः दोनों ही महानुभावों की योजनाएँ असफल रहीं। इसके विपरीत भगवान दयानन्द द्वारा आरोपित आर्यसमाज जिस धर्म (वैदिक) का प्रतिनिधित्व करता है, उसमें भोगवाद और आध्यात्मवाद दोनों को समन्वित किया गया है। यही कारण है कि आर्यसमाज की योजना प्रणाली सर्वहितकारी और जन जीवन मंगल विधान में समर्थ सिद्ध हो सकी है।
आर्यसमाज स्थापना शताब्दी की इस पावन वेला में हमें इस बात को पुनः पुनः स्मरण करना चाहिए कि हमारा आदर्श वैदिक आदर्श है, हमारा धर्म वैदिक धर्म है और हमारा विश्वास एक ईश्वर के प्रति है। यह विश्वास ही हमें निष्काम सेवा की प्रेरणा देता रहेगा और इस सेवा भाव से सच्छु रिव्रता का निर्माण होता है। वैयक्तिक, सामाजिक, लौकिक अथवा पार- लौकिक अभ्युदय वेदानुकरण द्वारा ही सम्भव है। इस उदात्त विचारधारा ने विश्व में वैचारिक क्रान्ति उत्पन्न की है जिसके फलस्वरूप परम्परित धार्मिक मान्यताओं में नवीन उन्मेष हुआ है, सामाजिक रूढ़ियों और धार्मिक कुरीतियों समाप्त हुई हैं, मानसिक दासता के बन्धन शिथिल हुए हैं और विश्व मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सुधार और प्रगति की स्थिति उत्पन्न होने लगी है।
ऐसी परिस्थिति में हम आर्य जनों को पुनः एक बार हृदयपूर्वक व्रत लेना होगा कि इस वैदिक विचारधारा के माध्यम से विश्वमात्न को ओत- प्रोत कर विश्वभर को आर्य बनायेंगे, विश्व के लोगों को एक भाषा, एक धर्म और एक संस्कृति का सन्देश देकर एकता के सूत्र में वाँधने का अहनिश प्रयत्न करें। आज हम सब इस बात का संकल्प करें कि निर्धारित दायित्व की पूर्ति करने, मानव समाज में आध्यात्मिक जीवन का संचार करने, आर्य संस्कृति की रक्षा करने, समाज को परिष्कृत करने और चरित्त निर्माण निमित्त कार्य करते रहेंगे ।
























