आर्य समाज के संस्थापक-स्वामी दयानन्द सरस्वती

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श्री अक्षयकुमार जैन

सम्पादक- नवभारत टाइम्स

भारत की यह खूबी रही है कि जब-जब और जिस-जिस प्रकार के व्यक्तियों की राष्ट्र को जरूरत पड़ी, तब-तब वैसे ही राष्ट्रनेताओं का आविर्भाव हो गया। महात्मा बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, विवेकानन्द की परम्परा में ही स्वामी दयानन्द भी आते हैं, जिन्होंने देश को रूढ़ियों में पड़ते जाने से बचाया। उन्हीं के शब्दों में मेरा देश जो संसार भर का शिक्षक रहा, संसार भर में धनीमानी रहा, संसार भर में सत्य और सदाचार में अनुकरणीय रहा, किसी प्रकार पुनः अपना वही पहला उच्च स्थान प्राप्त करें, यही मेरे हृदय की अभिलाषा है।” इसी अभिलाषा को पूरा करने में उन्होंने जीवन भर लगा दिया। वह जीवन पर्यन्त अखण्ड ब्रह्मचारी रहे, किन्तु गृहस्थों के दुखों का भान करके उन्होंने भी उन्हें उपदेश दिये ।

यह संयोग की बात है कि महात्मा गांधी की तरह स्वामी दयानन्द भी गुजरात के रत्न थे। भारत के पश्चिमी भाग में सौराष्ट्र नामक प्रदेश है। उसे काठियावाड़ कहा जाता है। स्वराज्य से पहले गुजरात प्रदेश में मोरवी नाम का एक देसी राज्य था जिसके टंकारा नगर के जीवापुर मुहल्ले में महर्षि दयानन्द का जन्म हुआ ।

स्वामी जी के बचपन का नाम मूलशंकर था। उनके पूर्वज तिवाड़ी (त्रिपाठी) ब्राह्मण थे। पं० दर्शन जी के घर विक्रम संवत १८८१ (सन् १८२४) में महर्षि का जन्म हुआ। दयानन्द अपने पिता की ज्येष्ठ सन्तान थे। नाम उनका मूलशंकर रखा गया, किन्तु दुलार में उन्हें दयाराम भी कहा जाता था ।

इस प्रकार मूलशंकर का जन्म एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण कुल में हुआ। यही कारण है कि गृह त्यागी होने पर अनेक बार ऐश्वर्य-भोग के प्रलोभन मिलने पर भी दयानन्द अपने व्रत से न डिगे। ओखी मठ के महंत को एक बार उन्होंने स्पष्ट उत्तर दिया था “यदि मैं धन सम्पत्ति का इच्छुक होता तो पितृ-गृह छोड़कर कभी न आता क्योंकि मेरे पिता की सम्पनि इस मठ की सारी दौलत से किसी प्रकार भी कम नहीं है।”

उनके पिता दर्शन जी धर्म के प्रति दृढ़ आस्थावान थे। वह शिव के परम भक्त, तेजस्वी और कठोर स्वभाव के पुरुष थे। दर्शनजी की धर्म- परायणता का एक और प्रमाण डेमी नदी के किनारे उनका बनवाया हुआ कुबेरनाथ महादेव मंदिर मौजूद है।

मूलशंकर का विद्यारम्भ पांच वर्ष की आयु में हुआ। माता-पिता और अन्य वयोवृद्ध अभिभावक कुल की प्रथा के अनुसार उन्हें शिक्षा देने लगे और उस काल में उन्होंने बहुत से श्लोक और मंत्र कंठस्थ कर लिए। उपनयन संस्कार के बाद आठ वर्ष की आयु में ही सन्ध्योपासना आदि कार्यों का नियमपूर्वक पालन करना उन्होंने शुरू कर दिया। पिताजी की धर्मनिष्ठता के कारण दस वर्ष की आयु में ही मूलजी को पार्थिव पूजा का आदेश दिया गया ।

स्वामी जी की तीक्ष्ण बुद्धि का पता इस बात से चलता है कि चौदहवें वर्ष में पदार्पण करने से पहले ही व्याकरण और शब्द रूपावली का अभ्यास करके उन्होंने समस्त यजुर्वेद तथा अन्य वेदों के भी थोड़े अंश कंठाग्र कर लिए थे ।

चौदह वर्ष की आयु में ही कुल की प्रथा के अनुसार उनके वाग्दान की तैयारियाँ होने लगीं। पिता अधिक शिक्षा के पक्षपाती न थे। वह चाहते थे कि पुत्त्र उनकी भांति जमेदारी करे और सद्‌गृहस्थ बने, किन्तु पुत्त्र काशी जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहता था। वाग्दान तो स्थगित करने को पिता राजी हो गये पर काशी भेजने की बात उन्होंने अस्वीकार कर दी।

महर्षि के प्रारम्भिक जीवन में ऐसी घटना घटी जिसके कारण वह विरक्त हुए और उनके मस्तिष्क में प्रकाश का उदय हुआ । इस घटना से उनमें मूर्तिपूजा के प्रति अविश्वास जागा । यह घटना उस समय घटी जब मूलशंकर कुल तेरह वर्ष के थे। शिवरात्नि को धर्मनिष्ठ पिता ने उन्हें व्रत रखने का आदेश दिया। मूलजी ने विधिपूर्वक उपवास रखा और अन्य साथियों सहित नगर से बाहर बने शिवालय में पूजा के लिए पहुँचे ।

शिवरात्रि में चार पहर में चार बार पूजा का विधान है। इस बीच पुजारी को सोना नहीं चाहिए। बालक मूल जी का यह पहला ही अवसर था, इसलिए यह बहुत सावधान रहा कि उसे नींद न आये।

दूसरे पहर की पूजा समाप्त होने पर मूलजी ने देखा कि मन्दिर के व्रतधारी पुजारी और उपासक मन्दिर से बाहर जाकर सो रहे। यहाँ तक कि धर्मनिष्ठ पिता भी इस व्रत का पालन न कर सके और जब उस शिवरात्रि के उपासकों को अकेला मूलजी जाग रहा था तो उसने देखा कि एक बिल में से एक चूहा बाहर निकला और महादेव की पिडी पर चढ़ाई हुई अक्षत आदि सामग्री को खाने लगा। स्वतन्त्रतापूर्वक वह महादेव की मूर्ति के ऊपर भी घूम लेता ।

इस घटना को देखकर मूलजी के मन में सन्देह उत्पन्न हुआ। स्वयं स्वामी जी के शब्दों में “देखते-देखते मेरे मन में आया कि यह क्या है ? जिस महादेव की शान्त पवित्र मूर्ति की कथा, जिस महादेव के प्रचण्ड पशुपतास्त्र की कथा और जिस महादेव के विशाल वृषारोहण की कथा गत दिवस व्रत के वृतान्त में सुनी थी, क्या यह महादेव वास्तव में यही है?”

अपने सन्देहों को वह देर तक न झेल सके। पिता की कठोरता, धर्म- परायणता और शिवभक्ति से वह परिचित थे। धर्म के कठोर वाह्य विधानों के प्रति अपनी अनास्था को अपनी शारीरिक दुर्बलता का परिणाम मानना इस आयु में स्वाभाविक था। सम्भवतः इसी कारण उन्होंने स्पष्ट विरोध न किया। पर बालक का मन शान्त न रह सका। वह सोच रहा था कि सच्चे शिव के अभाव में ही इन शिव भक्तों का मन वास्तविक पूजा पाठ से पराङ्मुख है। व्रत के महात्म्य को जानते हुए भी उनमें निद्रा आदि के शैथिल्य का भी कदाचित् यही कारण है। बालक मूलशंकर ने मन में तय किया कि यथार्थ महादेव का दर्शन किये बिना में मूर्ति की पूजा नहीं करूंगा। इस निश्चय के बाद उसे नींद भी आने लगी और भूख भी सताने लगी। पिता ने अविश्वासी पुत्त्र को अधिक देर रोकना उचित न समझकर भेजने की आज्ञा दे दी। रात का समय, तीन कोस का फासला, इसलिए एक सिपाही के साथ मूल को घर भेज दिया, पर व्रत भंग न हो यह कहना वह न भूले ।

पढ़ने के लिए काशी न भेजकर गांव से थोड़ा दूर पर ही अध्ययन की व्यवस्था की गई थी, किन्तु इस बीच मूलजी के विवाह की तैयारियाँ हुई और पिता को पुन का इनकार मिलने पर उन्हें गाँव में ही बुला लिया गया। उधर विवाह की तैयारियाँ हो रही थीं तो एक दिन शाम को बिना किसी से कहे-सुने मूलशंकर ने २२ वर्ष की आयु में सदा के लिए घर का त्याग कर दिया।

घर से चलकर चार कोस दूर एक गाँव में उन्होंने रात बिताई। पास- पड़ौस में विख्यात लाला भक्त के पास वह पहुंचे, किन्तु वहाँ पर भी उनके ज्ञान की प्यास न बुझी। भगवा वस्त्र पहने मूलजी तीन महीने तक वैरा- गियों के साथ इधर-उधर घूमते रहे, फिर सिद्धपुर के मेले में वह पहुँचे। वहाँ पर उनके एक गाँव वासी ने उन्हें पहचान लिया और पिता को सूचना दे दी। पिता ने वहाँ पहुँच उन्हें पकड़ लिया।

पिता चाहते थे पुत्र गृहस्थ बने, पर पुल योगाभ्यास करणे मृत्यु- यन्त्रणा से मुक्ति पाना चाहता था। तीन दिन पिता की कैद में रहकर, चौथी रात को तीन बजे वह पहरेदारों के सो जाने पर निकल पड़े और फिर घर न लौटे। चौदह वर्ष तक वह अमृत की खोज में दत्तचित्त रहे। आठ साल तक नर्मद के तट पर योगाभ्यास करते रहे। इसी बीच उन्होंने ब्रह्मचारी का विधिवत रूपधारण किया और नियमानुसार उनका नाम मूलशंकर से दयानन्द रखा गया।

नर्मदा तट से वह उत्तराखण्ड की यात्रा पर गये। हरिद्वार में उन्हें तांत्रिक पण्डितों, जंगम सम्प्रदाय आदि अनेकों साधु सम्प्रदायों का परिचय हुआ। ज्ञान के लिए गुरू की खोज में दयानन्द मथुरा पहुँचे जहाँ उन्होंने दंडीस्वामी बिरजानन्द को प्राप्त कर लिया ।

दयानन्द की असली शिक्षा यहाँ पर हुई। ग्रन्थ अध्ययन के अलावा गुरू-शिष्य में वार्तालाप भी हुआ करता था। इस वार्तालाप में आर्यावर्त के पुनरुत्थान की चर्चा होती थी। दंडीजी की पाठशाला में दयानन्द ने लगभग तीन वर्ष तक अध्ययन किया। स्वामी विरजानन्द की शिक्षा- दीक्षा ने ही स्वामी दयानन्द को आदर्श सुधारक बना दिया। कहते हैं जब दयानन्द चलने को हुए तो उन्होंने गुरू दक्षिणा के रूप में आधा सेर लौंग गुरू की भेंट की, पर गुरू ने आर्शीवाद देते हुए कहा- “मैं तुम्हारे जीवन की दक्षिणा चाहता हूँ। प्रतिज्ञा करो कि जब तक जीवित रहोगे आर्य ग्रन्थों का प्रचार, अनार्य ग्रन्थों का खण्डन तथा वैदिक धर्म की स्थापना के हेतु अपने प्राण तक न्यौछावर कर दोगे।” ऋषि दयानन्द ने ‘तदास्तु’ कह गुरू की आज्ञा शिरोधार्य की ।

उसके बाद ऋषि दयानन्द ने देश भर का दौरा किया। वह राजे- रजवाड़ों में गये और जहां अनेक राजा-महाराजा उनके भक्त हो गये वहाँ कुछ नरेश अप्रसन्न भी हुए, पर उसकी चिन्ता उन्होंने नहीं की। उनके विरोधियों ने उनकी हत्या कराने के यत्न किये, किन्तु अन्त में उन्हें मुंह की खानी पड़ी। कर्णवास की घटना सर्वविदित है जहाँ हत्या करने के लिए आने वाला स्वामी जी के चरणों में गिर गया। बड़े-बड़े धुरंधर पण्डितों से उनका शास्त्रार्थ हुआ। उनकी दृढ़ता का सिबका उनके विरोधियों ने भी माना ।

स्वामी जी की सेवा के लिए कल्लू कहार नामक एक नौकर रहता था। वह स्वामी जी के सामान की चोरी करके भाग गया। षड्यन्त्र का आरम्भ वहीं हो गया। ३० सितम्बर, १८८३ को यथा नियम स्वामी जी दूध पीकर सोये, किन्तु कुछ देर बाद ही उन्हें उदरशूल हो निकला और उनकी निद्रा भंग हो गई। जी मचलाने लगा और तीन बार वमन हुआ । सुबह हुई, डाक्टर बुलाया गया, उसने दबा दी, किन्तु लाभ न हुआ तथा दिन में कई दस्त हुए।

१६ अक्तूबर तक डाक्टरी चिकित्सा चलती रही, किन्तु रोग बढ़ता ही गया। उसी दिन महर्षि को आबू भेजने का निर्णय हुआ। उन्हें डोली में ले जाया गया, किन्तु मार्ग लम्बा था। आबू पर्वत की चढ़ाई। किसी प्रकार वहाँ पहुँचे, किन्तु दशा बिगड़ती देख उन्हें अजमेर लाने का निर्णय किया गया।

२६ अक्तूबर को प्रातःकाल स्वामी जी अजमेर पहुँचे। चिकित्सा की गई, किन्तु दशा चिन्ताजनक हो गई। ३० अक्तूबर को ग्यारह बजे से ही श्वास की गति बढ़ गई। उनकी इच्छानुसार औषधि बन्द कर दी गई और उसी दिन सायंकाल ऋषि का देहावसान हो गया ।

महर्षि दयानन्द पहले व्यक्ति थे जिन्होंने राष्ट्र के लिए एक भाषा की बात कही। गुजराती भाषा-भाषी होते हुए भी उन्होंने हिन्दी को राष्ट्र- भाषा बनाने का उपदेश दिया। उनकी महत्ता इसलिए भी है कि उन्होंने राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाया। उस समय जो रूढ़ियवादिता फैल रही थी स्वामी जी ने वैज्ञानिक और विवेकशील दृष्टिकोण अपनाने का मार्गदर्शन

किया। वह गुजरात से होकर वहाँ बँधकर न रहे और समग्र भारत के ह – गये। उनके विचार साम्प्रदायिक न थे, जो कुछ उन्होंने सोचा वह राष्ट्र को उन्नत करने के लिए था और उसी में उन्होंने अपना जीवन अर्पण कर दिया।

आज उन के द्वारा स्थापित आर्य समाज को पूरे १०० वर्ष हो गये हैं। – इस अवसर पर आर्य समाज के माध्यम से समाज सुधार व हिन्दी के प्रचार व प्रसार के महान यज्ञ में आहुति देना प्रत्येक भारतीय का परमकर्तव्य है।

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