आदर्श आचार-व्यवहार

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🌷आदर्श आचार-व्यवहार🌷


यद्यदात्मनि चेच्छेत तत्परस्यापि चिन्तयेत् ।।-(महा० शा० २५९/२२)
अपने लिए जिन-२ बातों की इच्छा हो,उनकी दूसरों के लिए भी इच्छा करनी चाहिए।


न तत्परस्य सन्दध्यात्प्रतिकूलं यदात्मनः ।-(महा० उद्योग० ३८/७१)
जो बात अपने लिए प्रतिकूल जान पड़े,वह दूसरों के प्रति भी नहीं करनी चाहिए।


आभाषितश्च मधुरं प्रत्याभाषेत मानवान् ।-(महा० शा० ६७/३८)
यदि कोई वार्तालाप करे तो उससे मीठा और मधुर बोलना चाहिए।
आपद्युन्मार्गगमने कार्यकालात्ययेषु च ।


अपृष्टोऽपि हितान्वेषी ब्रूयात्कल्याणभाषितम् ।।-(शुक्र०नि० २/२२३)
यदि किसी पर आपत्ति आ जाए,यदि कोई बुरे मार्ग पर चलने लगे तथा किसी का काम करने का समय बीत रहा हो तो बिना पूछे भी हितैषी पुरुष को उसके लिए हितकारी बात बता देनी चाहिए।
प्रसादयेन्मधुरया वाचा वाप्यथ कर्मणा ।


तवास्मीति वदेन्नित्यं परेषां कीर्तयन् गुणान् ।।-(महा० शा० १२३/२३)
मनुष्य को चाहिए कि मीठी वाणी और उत्तम व्यवहार के द्वारा सबको प्रसन्न रक्खे,दूसरों के गुणों का वर्णन करते हुए सबसे यही कहे-“मैं आपका ही हूँ, आप मुझे अपना ही समझे।


लोष्ठमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नरः ।
नित्योच्छिष्टः संकुसुको नेहायुर्विन्दते महत् ।।-(महा० अनु० १०४/१५)

व्यर्थ ही मिट्टी के ढेले फोड़ने वाला, तिनके तोड़ने वाला, दाँतों से नाखून चबाने वाला, सदा झूठा मुख रखने वाला,ऐसे कुलक्षणयुक्त कुसंस्कारी मनुष्य को दीर्घायु प्राप्त नहीं होती।


उदक्शिरा न स्वपेत तथा प्रत्यक्शिरा न च ।
प्राक्शिरस्तु स्वपेद्विद्वानथवा दक्षिणाशिराः ।।-(महा० अनु० १०४/४८)

अर्थ:- उत्तर और पश्चिम की ओर सिर करके न सोये। विद्वान् मनुष्य को पूर्व या दक्षिण की और सिर करके सोना चाहिए।


नान्यदोषान्ब्रूयात् ।-(च० सू० ८/१९)
दूसरों के दोषों को नहीं कहना चाहिए।


नान्यरहस्यमागमयेत् ।-(चरक० सू० ८/१९)
दूसरों की गुप्त बातों को जानने का यत्न नहीं करना चाहिए।


न भयमुत्पादयेत् ।-(च० सू० ८/१९)
किसी को भयभीत नहीं करना चाहिए।


न मद्य-द्यूत-वेश्या-प्रसङ्गरुचिः स्यात् ।-(च० सू० ८/२५)
मदिरा=शराब पीने, जुआ खेलने और वेश्यागमन की इच्छा नहीं करनी चाहिए।


न कञ्चिदवजानीयात् ।-(चरक० सू० ८/२५)
किसी का अपमान नहीं करना चाहिए।


धर्मान्न प्रमदितव्यम् ।-(तैत्ति० उप० शी० ११/१)
धर्माचरण करने में प्रमाद नहीं करना चाहिए।


न बलस्थोऽहमस्मीति नृशंसानि समाचरेत् ।-(महा० शा० १३३/१९)
‘मैं बलवान हूँ, मैं ऊँचे अधिकार पर स्थित हूँ, मेरा कोई क्या बिगाड़ सकता है’, ऐसा समझकर किसी के प्रति अन्याय और अत्याचार नहीं करना चाहिए।


न सीदन्नपि धर्मेण मनोऽधर्मे निवेशयेत् ।-(मनु० ४/१७१)
धर्माचरण से कष्ट पाने पर भी मन को अधर्म में नहीं लगाना चाहिए।


संलापं नैव शृणुयाद् गुप्तः कस्यापि सर्वदा ।-(शुक्रनी० ३/१४४)
किसी की बातचीत को छिपकर नहीं सुनना चाहिए।


पूज्यैः सह नाधिरुह्य वदेत् ।-(नीतिवाक्यामृत १७/२७)
पूज्यों के साथ बढ़-चढ़कर बातें नहीं करनी चाहिएँ।


करिष्यामीति ते कार्यं न कुर्यात्कार्यलम्बनम् ।-(शुक्रनी० २/२३२)
‘मैं तुम्हारा कार्य करूँगा’-किसी को ऐसा वचन देकर उसके काम में विलम्ब नहीं करना चाहिए।


मूत्रं नोत्तिष्ठिता कार्यम् ।-(महा० अनु० १०४)
खड़े होकर पेशाब नहीं करना चाहिए।
विशेष-हार्ट-फेल होने के अनेक कारणों में से एक कारण खड़े होकर पेशाब करना भी है।


न नक्तं दधि भुञ्जीत ।-(चरक० सू० ८/२०)
रात्रि में दही नहीं खाना चाहिए।
विशेष-रात्रि में दही का सेवन शरीर की शोभा और कान्ति को नष्ट करता है व आयु घटाता है।


आर्द्रपादस्तु भुञ्जानो वर्षाणां जीवते शतम् ।-(महा० अनु० १०४/६२)
पैरों को भिगोकर (पैर धोकर) भोजन करने वाला मनुष्य सौ वर्ष तक जीवित रहता है, (अतः पैर धोकर भोजन करना चाहिए )।
परमेश्वर


एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति ।-(ऋ० १/१६४/४६)
एक ही परमात्मा को विद्वान लोग अनेक नामों से पुकारते हैं।


यस्य भूमिप्रमान्तरिक्षमुतोदरम्
दिवं यश्चक्रे मूर्धानं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः ।।-(अथर्व० १०/७/३२)
पृथिवी जिस परमात्मा के पैरों के समान है, अन्तरिक्ष जिसका उदर है, द्युलोक जिसका सिर है, ऐसे सबसे महान् परमेश्वर को बारम्बार नमस्कार है।


वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसा परस्तात् ।
तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ।।-(यजु० ३१/१८)

मैं उस महान पुरुष (ब्रह्म,परमेश्वर) को जानूँ,जो सूर्य के समान देदीप्यमान और अज्ञान-अन्धकार से सर्वथा रहित है।उसी को जानकर मनुष्य मृत्यु को भी लाँघ जाता है।उसे जाने बिना मृत्यु से छूटने का,मोक्ष की प्राप्ति का और कोई उपाय नहीं है।


वृद्ध, विद्वान्
वृद्धान् नाभिभवेज्जातु न चैतान् प्रेषयेदिति ।
नासीनः स्यात्स्थितेष्वेवमायुरस्य न रिष्यते ।।-(महा० अनु० १६२/४५)

वृद्ध पुरुषों का कभी अपमान न करे, न उन्हें नौकरों की भाँति किसी काम के लिए भेजे।यदि वे खड़े हों तो स्वयं बैठा न रहे।
ऐसा करने से उस मनुष्य की आयु क्षीण नहीं होती।


न जातु त्वमिति ब्रूयादापन्नोऽपि महत्तरम् ।
त्वंकारो वा वधं वेति विद्वत्सु न विशिष्यते ।।-(महा० अनु० १६२/५२)

बड़े-से-बड़ा संकट पड़ने पर भी वृद्ध पुरुषों के प्रति ‘तू’ या ‘तुम’ शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए।किसी को ‘तू’ कहकर पुकारना अथवा उसका वध कर देना-इन दोनों बातों में विद्वान् लोग कोई अन्तर नहीं समझते।


शतं विहाय भोक्तव्यं सहस्रं स्रानमाचरेत् ।
लक्षं विहाय दातव्यं कोटिं त्यक्त्वा हरिं भजेत् ।।

सौ कार्यों को छोड़कर भोजन करना चाहिए, हजारों कामों को छोड़कर स्नान करना चाहिए, लाखों कार्यों को छोड़कर दान देना चाहिए और करोड़ों कार्यों को छोड़कर प्रभु-भक्ति करनी चाहिए।


षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ।।-(विदुरनी० १/८३)

ऐश्वर्य चाहने वाले मनुष्य को इस संसार में निम्न छह दोष छोड़ देने चाहिएँ-१.बहुत अधिक सोना, २.ऊँघते रहना, ३.भयभीत होना, ४.क्रोध करना,५.आलस्य और ६.कार्यों को विलम्ब से करना, एक घण्टे के कार्य में चार घण्टे लगाना(दीर्घसूत्रता) ।


दीर्घसूत्री विनश्यति
दीर्घसूत्री=कार्यों को बहुत धीरे-धीरे करने वाला नष्ट हो जाता है।


[ साभार: स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती ]

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