अनंतलाल सिंह: एक क्रांतिकारी का अद्वितीय सफर

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मुख्य भूमिका,

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनेक वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी, कुछ को भुला दिया गया, तो कुछ को इतिहास ने विवादों में डाल दिया। ऐसा ही एक नाम है अनंतलाल सिंह, जिनका जीवन स्वतंत्रता संग्राम, संघर्ष, क्रांति और विचारधाराओं के बदलाव का प्रतीक रहा। वे चटगाँव शस्त्रागार कांड के प्रमुख योद्धाओं में से एक थे और मास्टर सूर्यसेन के निकटस्थ सहयोगी रहे।

1 दिसंबर 1903 को वर्तमान बांग्लादेश के चटगाँव में जन्मे अनंतलाल सिंह के पूर्वज पंजाबी राजपूत थे, जो आगरा से आकर चटगाँव में बस गए थे। छात्र जीवन में ही वे मास्टर सूर्यसेन के संपर्क में आए और उनके प्रति पूरी तरह समर्पित हो गए।

वे असहयोग आंदोलन से प्रभावित तो हुए, लेकिन उनकी असली रुचि सशस्त्र क्रांति में थी। उन्हें बम और हथियार बनाने में महारत हासिल थी, और कहा जाता है कि इस कला का प्रशिक्षण उन्हें किसी अंग्रेज विशेषज्ञ से मिला था।

14 दिसंबर 1923 में मास्टर सूर्यसेन की योजना के तहत आसाम बंगाल रेलवे के कोषागार पर हमला कर खजाना लूट लिया। इसके बाद उन्होंने कई अन्य क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लिया और 1924 में गिरफ्तार होकर चार साल की सजा काटी।

चटगाँव शस्त्रागार हमला (1930) उनकी सबसे प्रसिद्ध क्रांतिकारी कार्रवाई थी। इसमें वे प्रमुख रणनीतिकारों में से एक थे। इस हमले के बाद वे चंद्रनगर (फ्रांस के अधीन क्षेत्र) भाग गए, लेकिन अपने पकड़े गए साथियों पर हुए अत्याचारों से व्यथित होकर उन्होंने 28 जून 1930 को आत्मसमर्पण कर दिया। जेल में रहते हुए भी उन्होंने जेल को डायनामाइट से उड़ाने की योजना बनाई, जिसके कारण ब्रिटिश सरकार को क्रांतिकारियों से वार्ता करनी पड़ी।

कारावास, वैचारिक परिवर्तन और स्वतंत्र भारत में भूमिका

ब्रिटिश सरकार ने उन्हें आजीवन कारावास देकर अंडमान (काला पानी) भेज दिया। वहाँ अन्य क्रांतिकारियों के साथ किए गए आमरण अनशन (1932) के बाद उन्हें भारत की मुख्यभूमि पर लाया गया।

1946 में जेल से मुक्त होने के बाद, उन्होंने मार्क्सवादी साहित्य का अध्ययन किया और विचारों में बदलाव के चलते कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) से जुड़ गए। लेकिन स्वतंत्रता के बाद बढ़ते भ्रष्टाचार और पूँजीवाद से असंतुष्ट होकर उन्होंने रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया नामक संगठन बनाया।

विवाद और अंतिम समय

उनके संगठन पर कलकत्ता में कई बैंक डकैतियों में शामिल होने के आरोप लगे और 1969 में उन्हें झारखंड के जादूगुड़ा जंगलों से गिरफ्तार कर लिया गया। 1977 में जेल से रिहा होने के बाद, वे गंभीर हृदय रोग से पीड़ित हो गए और 25 जनवरी 1979 को उनका निधन हो गया।

उन्होंने कई किताबें लिखीं, जिनमें “Some Call Me a Robber, Some Call Me a Revolutionary” उनकी आत्मकथा के रूप में चर्चित रही। इसके अलावा उन्होंने “चटगाँव युवाविद्रोह”, “अग्निगर्भा चटगाँव”, “मास्टर दा”, और “सूर्य सेनार स्वपना ओ साधना” जैसी रचनाएँ लिखीं।

निष्कर्ष

अनंतलाल सिंह का जीवन क्रांतिकारी संघर्ष, विचारधारात्मक बदलाव और स्वतंत्रता के लिए बलिदान का प्रतीक था। वे भारतीय इतिहास के उन योद्धाओं में से एक थे, जिनकी कहानियाँ भले ही विवादित रही हों, लेकिन उनका योगदान अमिट है। वे सशस्त्र क्रांति के समर्थक थे, लेकिन स्वतंत्रता के बाद उनकी राजनीतिक विचारधारा ने एक नया मोड़ लिया। उनका जीवन स्वतंत्रता संग्राम के अनछुए पहलुओं को उजागर करता है, जिन्हें इतिहास में अधिक स्थान नहीं मिला।

विस्तृत जीवन परिचय

1 दिसंबर 1903 को वर्तमान बांग्लादेश के चिटगांव में गोलप सिंह के यहाँ जन्में अनंतलाल सिंह उन क्रांतिकारियों में शामिल थे, जिन्होंने 1930 में हुए चटगाँव शस्त्रागार केस में भाग लिया था। उनके पूर्वज पंजाबी राजपूत थे जो आगरा से चटगाँव जाकर बस गए थे। चटगाँव म्युनिसिपल स्कूल में पढ़ते समय वो अपने छात्रों के हृदय में क्रान्ति की ज्वाला प्रज्वलित करने वाले मास्टर दा नाम से विख्यात मास्टर सूर्यसेन के संपर्क में आये और उनके भक्त हो गए। शीघ्र ही अपने साहस, संगठनात्मक योग्यता, बुद्धिकौशल और कार्य के प्रति समर्पण से वो मास्टर दा के प्रिय हो गए और उनके निकटस्थ सहयोगियों में शामिल माने जाने लगे। अनंत लाल जी का स्वतंत्रता आन्दोलन से सर्वप्रथम संपर्क असहयोग आन्दोलन के द्वारा हुआ, जिसमें भाग लेने के लिए उन्होंने अपने ना जाने कितने ही साथियों को प्रेरित किया, हालांकि उनका खुद का बहुत अधिक यकीन इस तरह के आन्दोलन पर नहीं था। वो क्रांतिकारियों के लिए कारतूस और बम बनाने का कार्य करते थे, जिसमें उन्हें महारत हासिल थी और जिसे बनाने का प्रशिक्षण उन्हें किसी अंग्रेज से ही मिला था, ऐसा विश्वास किया जाता है।

14 दिसंबर 1923 को मास्टर सूर्यसेन की योजना के अनुरूप अनंतलाल जी ने निर्मल सेन के साथ मिलकर आसाम बंगाल रेलवे के कोषागार पर हमला किया और वहां से खजाना लूट लिया। 24 दिसंबर को पुलिस से उनकी मुठभेड़ हुयी पर वो वहां से निकल भागे और कुछ समय तक पहाड़ी क्षेत्रों में छिपने के बाद कलकत्ता पहुँच गए, जहाँ वो गिरफ्तार कर लिए गए पर शीघ्र ही छोड़ दिए गए। 1924 में उन्हें पुनः गिरफ्तार कर लिया गया और 4 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गयी। रिहा होने के बाद, अनंत लाल जी ने अपनी कार्यशैली में परिवर्तन किया और एक व्यायामशाला खोली और इसके जरिये अपने संगठनात्मक कौशल के बल पर मास्टर दा के आन्दोलन के लिए ना जाने कितने ही युवाओं को तैयार किया। चटगाँव शस्त्रागार हमले की योजना बनाने में भी वे सबसे आगे रहे और 18 अप्रैल 1930 को अंग्रेजों को हिला देने वाले इस में शामिल क्रांतिकारियों में से भी एक वे स्वयं थे। इस घटना में कई क्रांतिकारी बलिदान हुए और कई पकडे गए पर अनंतलाल जी फ़्रांस के कब्जे वाले चंद्रनगर चले गए और पकड़ में नहीं आये। पर अपने पकडे गए साथियों पर पुलिस द्वारा किये जा रहे भीषण अत्याचारों की खबरें सुनने के बाद उन्होंने 28 जून 1930 को कलकत्ता में पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। उन्हें जेल भेज दिया गया पर उन्होंने इस जेल को ही डायनामाइट से उड़ाने की योजना बना ली। उन्हें जेल की दीवाल में डायनामाइट लगाते हुए पकड़ लिया गया और ऐसा विश्वास किया जाता है कि इसी घटना ने अंग्रेजी सरकार को क्रांतिकारियों से बातचीत करने के लिए विवश किया। उन पर मुकदमा चला और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाने के बाद काला पानी अंडमान भेज दिया गया। 1932 में किये गए एक लम्बे आमरण अनशन के बाद उन्हें कई साथी कैदियों के साथ वापस भारत की मुख्यभूमि पर लाया गया। 1946 में उन्हें जेल से मुक्त किया गया, जिसके बाद जेल में मार्क्सवादी साहित्य को पढ़कर खुद के विचारों में आये परिवर्तनों के अनुरूप वो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया में शामिल हो गए। देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद, अनंतलाल जी ने खुद को व्यवसाय में लगा लिया और खुद को राजनीति से दूर कर लिया। देश में भ्रष्ट और पूंजीवादी व्यवस्था के बढ़ते प्रभाव से विचलित होकर अनंतलाल जी ने कलकत्ता में एक अति कट्टरवादी वामपंथी संगठन रिवोल्युशनरी कम्युनिस्ट काउन्सिल ऑफ़ इंडिया का गठन किया, जिसके सदस्यों ने अस्त्र शस्त्र खरीदने के लिए कलकत्ता में कई बैंक डकैतियां डालीं।

कुछ समय बाद 1969 में इस संगठन के सभी सदस्यों सहित अनंतलाल जी को भी वर्तमान झारखंड के जादूगुडा के जंगलों से उनके ठिकाने से गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें 1977 तक जेल में रहना पड़ा और इसी दौरान उन्हें हृदय सम्बन्धी समस्याएं हो गयीं। इन्हीं के चलते अपनी रिहाई के कुछ समय बाद 25 जनवरी 1979 को उनका निधन हो गया। कुछ लोगों का मानना है कि उनके नए संगठन ने इस तरह का कोई काम नहीं किया था, जिसे विधि विरुद्ध कहा जा सके और अंग्रेजी शासन के दिनों में उनके द्वारा की गयी डकैतियों के मामलों में ही तत्कालीन सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था क्योंकि वो अपने भाषणों और लेखों में सरकार का मुखर विरोध करते थे। यदि सच में उन्होंने ऐसा कोई कार्य किया था तो आज़ादी के बाद का उनका सशस्त्र आन्दोलन किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं ठहराया जा सकता पर इससे देश के लिए उनके योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता। अनंतलाल जी ने कई पुस्तकें भी लिखी जिसमें सबसे ज्यादा जानी मानी है उनकी विवादित आत्मकथा- केऊ बोले डकैत, केऊ बोले बिप्लवी (Some Call Me a Robber, Some Call Me a Revolutionary)। उनकी कुछ और प्रमुख रचनाएँ हैं- चटगाँव युवाविद्रोह (Youth Revolution in Chittagong), अग्निगर्भा चटगाँव (Chittagong on Fire), मास्टर दा (अमर शहीद सूर्यसेन पर), सूर्य सेनार स्वपना ओ साधना (Dream and Austerities of Surya Sen) एवं अमी सेइ मेये (I am that Girl)।

विनम्र श्रद्धांजलि।🙏🙏