कर चले हम फिदां जाने तन साथियों
कर चले हम फिदां जाने तन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों।
सांस थमती गयी, नब्ज जमती गयी,
फिर भी बढ़ते कदमों को न रुकने दिया।
कट गए सर हमारे तो कुछ गम नहीं,
सर हिमालय का हमने न झुकने दिया।
मरते-मरते रहा बांकापन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों। (1)
जिन्दा रहने के मौसम बहुत हैं मगर,
जान देने की रुत रोज आती नहीं।
हुस्न और इश्क दोनों को रुसवा करे,
यह जवानी जो खूँ में, नहाती नहीं।
आज धरती बनी हैं दुल्हन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों। (2)
राह कुर्बानियों की न वीरान हो,
तुम सजाते ही रहना नए काफिले।
फतह का जश्न इस जश्न के बाद है,
जिंदगी मौत से मिल रही है गले।
बांध लो अपने सर पे कफन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों। (3)
खींच दो अपने खूँ से, जमीं पर लकीर,
इस तरफ आने पाए न रावण कोई।
तोड़ दो हाथ, अगर हाथ उठने लगे,
छूने पाये न सीता का, दामन कोई।
राम हो तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियों,
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों। (4)
औरों के हम दोष न देखें, अपने दोष विचारें।
निन्दा करें न कभी किसी की, यही एक गुण हम धारें।।
“हम आजादी तभी पाते हैं, जब अपने जीवित रहने का पूरा मूल्य चुका देते हैं – रविन्द्रनाथ टैगौर










