श्रद्धा और आनन्द की इक खान श्रद्धानन्द थे।

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श्रद्धा और आनन्द की इक खान श्रद्धानन्द थे।

श्रद्धा और आनन्द की
इक खान श्रद्धानन्द थे।
धर्म पै जो हो गये
बलिदान श्रद्धानन्द थे।।1।।

बिन्दुओं से रक्त के सींची थी
वैदिक वाटिका।
महर्षि जो राम थे,
हनुमान श्रद्धानन्द थे।।2।।

मनके बिखरे थे माला के,
पिरोया उन्हें।
शुद्धि है जीवन तो,
इसमें जान श्रद्धानन्द थे।।3।।

चाँदनी के चौक दिल्ली
की मिलें हैं साक्षी।
तान जब छाती खड़े,
बलवान श्रद्धानन्द थे।।4।।

जामा मस्जिद के चढ़े
मिम्बर पै दिल्ली खास में।
देशे पुतले सत्य के
श्रीमान श्रद्धानन्द थे।।5।।

“हमें समस्त हिन्दु जाति को एक साथ समरसता के भाव में पिरोना होगा।” – स्वामी श्रद्धानन्द