प्रभु भक्ति में मन को लगाइए,
प्रभु भक्ति में मन को लगाइए,
वह सब का पालन हार है।
दुःख दूर करेगा परमात्मा,
वह सुखों का भंडार है।।1।।
खाली उसके द्वार से आए,
ऐसा कभी नहीं हो सकता।
परमपिता को भूल के प्राणी,
सुख से कभी ना सो सकता।
सारी सृष्टि का वह आधार है,
उसकी महिमा का पाया न पार है।
दुःख दूर करेगा परमात्मा,
वह सुखों का भंडार है।।2।।
भाई-बन्धुमाल खजाना,
साथ तेरे न जायेगा।
धर्म ही है इक अन्त का,
साथी काम तेरे जो आयेगा।
शुभ कर्मों से होता बेड़ा पार है।
नाव पापी की डूबे मझधार है।
दुःख दूर करेगा परमात्मा,
सब सुखों का भंडार है।। 3।।
विषयों में फैंस करके बन्दे,
जीवन को बरबाद न कर।
नर तन चोला उत्तम है यह,
पाप न कर, अपराध न कर।
‘नन्दलाल’ प्रभु निराकार है,
नमस्कार उसे बार-बार है।
दुःख दूर करेगा परमात्मा,
सब सुखों का भंडार है।4।।










