मन्दिर में पड़ी मूर्ति, कुछ खा न सकेगी
मन्दिर में पड़ी मूर्ति, कुछ खा न सकेगी,
पूछो जो कोई बात तो, बतला न सकेगी,
जो बात करोगे तो, वह खामोश रहेगी,
उठकर चले जाओगे तो, यह कुछ न कहेगी।
मन्दिर में पड़ी मूर्ति…….
जड़ वस्तु है वह वहाँ से, कहीं जा न सकेगी,
न भूख लगेगी उसे, न प्यास लगेगी।
न सोयेगी वह रात को, न दिन को जागेगी,
रोयेगी कभी नहीं, न कभी गा ही सकेगी।
मन्दिर में पड़ी मूर्ति……..
रख दोगे अगर खाने को, फल फूल मिठाई,
आ जाएगा चूहा तो, वह कर देगा सफाई।
मक्खी को भी मुखड़े से, वह उड़ा न सकेगी,
मन्दिर में पड़ी मूर्ति…….
सत्य पुरुषों का संग करो, मन शुद्ध बनाओ।
‘नन्दलाल’ अगर ज्ञान की, गंगा में नहाओ।
मल पापों की फिर, मन पै कभी आ न सकेगी।
मन्दिर में पड़ी मूर्ति……….










