मधुर वेद वीणा बजाये चला जा।
मधुर वेद वीणा बजाये चला जा।
जो सोते हैं उनको जगाए चला जा।
निराकार प्रभु है सभी में समाया
सभी जन हैं अपने न कोई पराया।
घृणा फूट मन से मिटाए चला जा।।
मधुर वेद वीणा……..
चुराना नहीं लोभवश धन किसी का,
दुखाना नहीं तुम कभी मन किसी का।
ये संदेश घर-घर सुनाए चला जा।।
मधुर वेद वीणा…….
जगत् युद्ध की ज्वाला में,
जल रहा है,
प्रबल चक्र अन्याय का
चल रहा है।
मनुजता जगत् को
सिखाए चला जा।।
मधुर वेद वीणा…….
अखिल विश्व में भावना भव्य करके,
स्वकर्त्तव्य उद्देश्य को पूर्ण करके।
तू ऋषिराज का ऋण चुकाए चला जा।।
मधुर वेद वीणा…….
‘प्रकाश’ आर्य ग्रामों गली हाट में,
नगर देश देशान्तरों विश्व भर में।
दयानन्द की जय मनाए चला जा।।
मधुर वेद वीणा………










