क्या कहूँ क्या-क्या मिला
क्या कहूँ क्या-क्या मिला,
मुझको प्रभु के ध्यान में।
एक अलौकिक-सुख मिला,
जब मन लगा भगवान में।
जब भी उसके गीत गाए,
शुद्ध अन्तर्मन हुआ,
सद्गुणों का कोष पाया,
ईश के गुणगान में।।
क्या कहूँ क्या-क्या मिला, मुझको…….
जैसे एक व्याकुल नदी,
सागर से मिलकर तृप्त हो,
तृप्ति ऐसी ही अवर्णनीय,
पाई ध्यान में।।
क्या कहूँ क्या-क्या मिला, मुझको…..
जैसे पतझड़ में बसंत,
आ जाए मस्ती संग ले,
पुष्प अनगिन खिल गए,
त्यों आत्मिक उद्यान में।।
जिसको देखो, बस उसी को,
मन समर्पित हो गया,
भेद कुछ भी न रहा,
फिर मान और अपमान में।।
क्या कहूँ क्या-क्या मिला, मुझको…….
अहम् सारा मिट गया,
भय-भ्रम भी सारा हट गया,
लग गई सब इंद्रियाँ ही,
आत्मिक उत्थान में।।
क्या कहूँ क्या-क्या मिला, मुझको ……..
मुस्कुराहट रहती है,
होठों पर हरदम ही मेरे,
रूप जब से कह गया,
प्रभु जाने क्या इस कान में।।
क्या कहूँ क्या-क्या मिला, मुझको…….
अब भला संसार का,
वैभव मुझे क्या चाहिए?
पा लिया है रूप मैंने,
प्रभु के ही वरदान में।।
क्या कहूँ क्या-क्या मिला, मुझको……..










