अरे प्राणी क्यों सोया है, यह जीवन ढलता जाता है।

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शिक्षा

अरे प्राणी क्यों सोया है,
यह जीवन ढलता जाता है।
मिला अनमोल था हीरा,
वृथा इसको गँवाता है।।

हुआ अब तो सबेरा है-
तुझे आलस्य ने घेरा है।
जिन्हें अपना समझता है,
न इनमें कोई तेरा है।।
यह दुनिया एक सराय है,
कोई आता कोई जाता है।।
अरे प्राणी क्यों सोया है यह जीवन ……

न सम्पत्ति न यह परिवार,
तेरे साथ जाएँगे।
किये शुभ कर्म जो तूने,
अन्त में काम आएँगे।।
हैं सब शमशान तक साथी,
जगत स्वार्थ का नाता है।
अरे प्राणी क्यों सोया है यह जीवन ….

गर्भ में किया जो वायदा,
उसे क्यों भूलता बंदे।
ये इक दिन छूट जाएँगे
सभी संसार के धंधे।।
तू क्यों मकड़ी की भाँति जाल,
दुनिया में बिछाता है।।
अरे प्राणी क्यों सोया है यह जीवन …….

तू कर ले साधना साधक,
यदि मुक्ति को पाना है।
पड़ी मझधार में किश्ती,
किनारे जो लगाना है।।
ले आनंद उसकी गोद का,
जगत जननी जो माता है।
अरे प्राणी क्यों सोया है यह जीवन……..

हवन सन्ध्या समाधि में,
जो मन अपना लगायेगा।
जो परोपकार में ‘नंदलाल’
जीवन को बितायेगा।।
वह ही इतिहास के पन्नों में,
नाम अपना लिखाता है।।
अरे प्राणी क्यों सोया है यह जीवन…….