अचरज है जल में रहकर भी, मछली को प्यास है

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अचरज है जल में रहकर भी, मछली को प्यास है

भक्ति

अचरज है जल में रहकर भी,
मछली को प्यास है,
फूलों में ज्यों सुवास,
ईख मे मिठास है,
भगवन् का त्यों विश्व के,
कण-कण में वास है।।
अचरज है जल में रहकर भी….

टुक ज्ञान चक्षु खोल,
के तू देख तो सही,
जिसको तू ढूँढ़ता है,
सदा तेरे पास है।।
अचरज है जल में रहकर भी…..

कुछ तो समय निकाल,
आत्म-शुद्धि के लिए,
नर-जन्म का उद्देश्य,
न केवल विलास है।।
अचरज है जल में रहकर भी…….

आनन्द मोक्ष का,
ना पा सकेगा तब तलक,
तू जब तलक ‘प्रकाश’
इन्द्रियों का दास है।।
अचरज है जल में रहकर भी……

सुविचार

अग्ने मेधाविनं कुरुः
हे प्रभु! हमें बुद्धिमान बनाओ।