स्वामी दयानंद जी को वेदार्थ ज्ञान कैसे हुआ?

0
60

स्वामी दयानंद जी को वेदार्थ ज्ञान कैसे हुआ?

स्वामी दयानंद जी (1825–1883) ने अपनी आत्मकथा में लिखा है: मैंने अपने घर में यजुर्वेद पढ़ा था और वहीं पर संपूर्ण यजुर्वेद कंठस्थ कर लिया था। उनके पिताजी औदिच्य ब्राह्मण थे, जो सामवेदी होते हैं। फिर भी, दयानंद जी (तब के मूलशंकर) ने घर पर यजुर्वेद का अध्ययन किया। ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय उन्होंने केवल वेद को कंठस्थ किया होगा, लेकिन अर्थ का ज्ञान सीमित ही रहा होगा।

गृहत्याग के पश्चात्, जिन साधु-संन्यासियों से उनका संपर्क हुआ, वे भी वेदों का गहन ज्ञान नहीं रखते थे। मथुरा की पाठशाला में स्वामी विरजानंद जी दण्डी के सान्निध्य में भी संभवतः वेद संहिताएँ उपलब्ध नहीं थीं। वहां उन्होंने वैदिक व्याकरण, अष्टाध्यायी और महाभाष्य का अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने आगरा में लंबे समय तक रहकर और धौलपुर, ग्वालियर आदि स्थानों का भ्रमण करते हुए वेद-संहिताओं को प्राप्त करने में सफलता पाई, ऐसा लगता है।

स्वामी दयानंद ने स्वाध्याय, वैदिक आर्ष ग्रंथों की सहायता, योग, तपस्या, सुतर्क और ईश्वर के अनुग्रह से वेदों के सत्यार्थ को जानने का प्रयास किया। उस समय का काल और परिस्थितियां वेदाध्ययन और वेदार्थ के अनुकूल नहीं थीं। बावजूद इसके, स्वामी जी ने कई वर्षों तक अपने सिद्धांतों को अंतिम रूप देने के लिए वेदाध्ययन कर अथक परिश्रम किया।

1875 में प्रकाशित सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम संस्करण में उनके दार्शनिक विचार कुछ भिन्न थे, जो यह इंगित करता है कि उस समय तक उन्होंने ऋषित्व प्राप्त नहीं किया था। बाद में, अपने गहन अध्ययन और चिंतन से, योग-साधना से उन्होंने ऋषित्व प्राप्त किया। सत्यार्थ प्रकाश के दूसरे संस्करण में उनके विचार अधिक सुस्पष्ट और परिपक्व दिखते हैं।

आज हमारे पास सत्यार्थ प्रकाश का प्रकाशित स्वरूप है, लेकिन उस समय स्वामी दयानंद के पास ऐसा कोई मार्गदर्शक ग्रंथ नहीं था। उन्हें सत्यार्थ प्रकाश का निर्माण स्वयं करना था। इसलिए उन्होंने अपने निष्कर्षों में निरंतर सुधार और परिशोधन किया और अंततः निश्चयात्मक ज्ञान की अवस्था प्राप्त कर हमें सत्यार्थ प्रकाश प्रदान किया।

उन्होंने वेदों की सर्वोपरि प्रतिष्ठा स्थापित करते हुए प्रतिपादित किया कि वेद ही सत्य की अंतिम कसौटी हैं।

पंडित युधिष्ठिर मीमांसक ने स्वामी दयानंद पर अपने अंतिम ग्रंथ में लिखा है: वेदार्थ-प्रकाश का रहस्य स्वामी दयानंद के भीतर ही अंतर्निहित था।

पंडित युधिष्ठिर जी मीमांसक ने जीवन पर्यंत स्वामी दयानन्द के जीवन कार्यों का गंभीर अध्ययन किया | उन्होंने अपने महत्त्वपूर्ण ग्रंथ “मेरी दृष्टि में स्वामी दयानन्द सरस्वती और उनके कार्य” में लिखा है :

“मेरी क्षुद्र बुद्धि में स्वामी दयानन्द सरस्वती को वेद का जो स्वरूप ज्ञात हुआ, उसका स्रोत कहीं बाहर नहीं, अपितु तत्स्थ (उनके भीतर) ही होना चाहिए।”

इस स्थान पर श्री युधिष्ठिर जी मीमांसक ने ऋग्वेद (10.71.5), निरुक्त (2.11) तथा तैत्तिरीय आरण्यक आदि के प्रमाणों के आधार पर निष्कर्ष रूप में लिखा है :

“वेद के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान दयानन्द सरस्वती को स्वाध्याय रूप परम तप से प्राप्त हुआ।”

(संदर्भ ग्रंथ: “मेरी दृष्टि में स्वामी दयानन्द सरस्वती और उनके कार्य”, द्वितीय संस्करण, संवत 2050, सन् 1993, पृष्ट 113-118, प्रकाशक: श्री राम लाल कपूर ट्रस्ट)

  • भावेश मेरजा